यह प्रश्न तसलीमा नसरीन ने भारतीय नेताओं, बुद्धिजीवियों से पूछा है। तस्लीमा की आत्मकथा निर्वासन का विमोचन समारोह कोलकाता पुस्तक मेले में रद कर दिया गया, क्योंकि इस्लामी कट्टरपंथियों ने विरोध किया। पुस्तक अभी सामने भी नहीं आई, पढ़ना तो दूर रहा। लेखिका भी कार्यक्रम में उपस्थित न रहने वाली थीं। फिर भी कट्टरपंथियों को मेले में उसके विमोचन पर आपत्ति थी। उनकी धमकी के बाद अधिकारियों ने कार्यक्रम रद कर दिया। इसी पर तसलीमा ने भारतवासियों से पूछा है कि मजहबी कट्टरपंथियों से कितने समय तक डरेंगे?
यह प्रश्न हमारे दो महापुरुषों की उक्ति भी याद दिलाता है। पहली श्रीअरविंद की, जब उन्होंने सौ वर्ष पहले (4 सितंबर 1909) उसी बंगाल में विविध मुस्लिम आपत्तियों और उन्हें संतुष्ट करने के प्रयासों पर कहा था कि प्रत्येक ऐसा कार्य जिस पर कुछ मुसलमानों को आपत्ति हो अब वर्जित कर दिया जा सकता है, क्योंकि उससे शांति भंग हो सकती है और कुछ-कुछ ऐसा लगने लगा है कि कहीं वह दिन न आ जाए जब इसी तर्कसंगत आधार पर हिंदू मंदिरों में पूजा करना भी वर्जित कर दिया जाए। दूसरा कथन 1946 में डॉ. अंबेडकर का था कि मुसलमानों की मांगें हनुमानजी की पूँछ की तरह बढ़ती जाती हैं।
इन दोनों कथनों के साथ तसलीमा के प्रश्न को जोड़कर देखने-समझने की आवश्यकता है। यदि तसलीमा की बात में

