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Monday, 25 July 2011

हिन्दुओं पर सरकारी आक्रमण-सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम विधेयक

श्री विजय कुमार शर्मा
सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद द्वारा प्रस्तावित सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा रोकथाम विधेयक (न्याय एवं क्षतिपूर्ति) 2011 विधेयक को केन्द्रीय सरकार ने स्वीकार कर लिया है। इस विधेयक का उद्देश्य बताया गया है कि यह देश में साम्प्रदायिक हिंसा को रोकने में सहायक सिद्ध होगा। इसको अध्ययन करने पर ध्यान में आता है कि यदि दुर्भाग्य से यह पारित हो जाता है तो इसके परिणाम केवल विपरीत ही नहीं होंगे अपितु देश में साम्प्रदायिक विद्वेष की खाई इतनी चौडी हो जायेगी जिसको पाटना असम्भव हो जायेगा।यहां तक कि एक प्रमुख सैक्युलरिस्ट पत्रकार,शेखर गुप्रा ने भी स्वीकार किया है कि,”इस बिल से समाज का साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण होगा। इसका लक्ष्य अल्पसंख्यकों के वोट बैंक को मजबूत करने के अलावा हिन्दू संगठनों और हिंदू नेताओं का दमन करना है।
जिस प्रकार सरकार की रुचि भ्रष्टाचार को समाप्त करने की जगह भ्रष्टाचार को संरक्षण देकर उसके विरुद्ध आवाज उठाने वालों के दमन में है,उसी प्रकार यह सरकार साम्प्रदायिक हिंसा को रोकने की जगह हिंसा करने वालों को संरक्षण और उनके विरुद्ध आवाज उठाने वाले हिंदू संगठनों और उनके नेताओं को इसके माध्यम से कुचलना चाहती है। इस अधिनियम के माध्यम से केन्द्र राज्य सरकारों के कार्यों में हस्तक्षेप कर देश के संघीय ढांचे को ध्वस्त कर देगा। यह भारतीय संविधान की मूल भावना को तहस-नहस करता हुआ भी दिखाई दे रहा है। यह अधिनियम एक नई तानाशाही को तो जन्म देगा ही, यह हिन्दू समाज की भावनाओं और उनको वाणी देने वाले हिन्दू संगठनों को भी कुचल देगा।

जिस राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की अनुशंसा(आदेश) पर इस विधेयक को लाया जा रहा है, वह एक समानांतर सरकार की तरह काम कर रही है। यह न तो एक चुनी हुई संस्था है और न ही इसके सभी सदस्य जनता के द्वारा चुने गये प्रतिनिधी हैं। सरकार जो तर्क “सिविल सोसाईटी या अन्य जन संगठनों के विरुद्ध प्रयोग करती है, वह स्वयं उस के विपरीत आचरण कर रही है।

राष्ट्रीय सलाहकार परिषद एक असंवैधानिक महाशक्ति है जो बिना किसी जवाबदेही के सलाह की आड़ में आदेश देती है। केन्द्र सरकार दासत्व भाव से उनके आदेशों को लागू करने के लिये हमेशा ही तत्पर रहती है। जिस ड्राफ्ट कमेटी ने इस विधेयक को बनाया है, उसके सदस्यों के चरित्र का विचार करते ही उनकी नीयत के बारे में किसी संदेह की गुंजाइश नहीं रहती है। इस समिती में 9 सद्स्य और उनके 4 सलाहकार हैं । इन सब में समानता के यही बिंदू है कि ये सभी हिंदू संगठनों के घोर विरोधी हैं, हमेशा गुजरात के हिन्दू समाज को कटघरे में खडा करने के लिये तत्पर रहते हैं और अल्पसंख्यकों के हितों का एकमात्र संरक्षक दिखने के लिये देश को भी बदनाम करने में संकोच नहीं करते।

हर्ष मंडेर रामजन्मभूमि आन्दोलन और हिन्दू संगठनों के घोर विरोधी हैं। अनु आगा जो कि एक सफल व्यवसायिक महिला हैं, गुजरात में मुस्लिम समाज को उकसाने के कारण ही एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में पहचानी जाती । तीस्ता सीतलवाड और फराह नकवी की गुजरात में भूमिका सर्वविदित है। उन्होंने न केवल झूठे गवाह तैयार किये हैं अपितु देश विरोधियों से अकूत धनराशी प्राप्त कर झूठे मुकदमे दायर किये हैं और जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने का संविधान विरोधी दुष्कृत्य किया है। आज इनके षडयंत्रों का पर्दाफाश हो चुका है, ये स्वयं न्याय के कटघरे में कभी भी खडे हो सकते हैं। ये लोग अपनी खीज मिटाने के लिये किसी भी सीमा तक जा सकते हैं।

जो काम वे न्यायपालिका के माध्यम से नहीं कर सके ,ऐसा लगता है वे इस विधेयक के माध्यम से करना चाहते हैं। एक प्रकार से इन्होनें अपने कुत्सित इरादों को पूरा करने के लिये चोर दरवाजे का प्रयोग किया है। इनके घोषित-अघोषित सलाहकारों के नाम इनका भंडाफोड करने के लिये पर्याप्त हैं।” मुस्लिम इन्डिया” चलाने वाले सैय्यद शहाबुद्दीन, धर्मान्तरण करने के लिये विदेशों में भारत को बदनाम करने वाले जोन दयाल, हिन्दू देवी-देवताओं का खुला अपमान करने वाली शबनम हाशमी और नियाज फारुखी जिस समिती के सलाहकार हों , वह कैसा विधेयक बना सकते हैं इसका अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है।

भारत के बडबोले मंत्री, कपिल सिब्बल द्वारा इस अधिनियम को सार्वजनिक करते हुए गुजरात के दंगों और उनमें सरकार की कथित भूमिका का उल्लेख करना सरकार की नीयत को स्पष्ट करता है। ऐसा लगता है कि सारी सैक्युलर ब्रिगेड मिलकर जो काम नहीं कर सकी, उसे सोनिया इस विधेयक के माध्यम से पूरा करना चाहती हैं। गुजरात के संदर्भ में सभी कसरतें व्यर्थ जा रही हैं। आरोप लगाने वाले स्वयं आरोपित बनते जा रहे हैं। कानून के शिकंजे में फंसने की दहशत से वे मरे जा रहे हैं। इस अधिनियम का प्रारूप देखने से ऐसा लगता है मानो उन्हीं चोट खाये इन तथाकथित मानवाधिकारवादी ने इसको बनाने के लिये अपनी कलम चलाई है।

इस विधेयक को सार्वजनिक करने का समय बहुत महत्वपूर्ण है। कुछ दिन पूर्व ही अमेरिका के ईसाईयत के प्रचार के लिये बदनाम “अंतर्राष्ट्रीय धर्म स्वातंत्र्य आयोग” ने भारत को अपनी निगरानी सूची में रखा है। उन्होंनें भी गुजरात और ओडीसा के उदाहरण दिये हैं।मानावधिकार का दलाल अमेरिका मानवाधिकारों के सम्बंध में अमेरिका का दोगलापन जगजाहिर है। इस आयोग को चिंता है ओडिसा और गुजरात की घटनाओं की, परन्तु उसको कश्मीर के हिन्दुओं या मणिपुर और त्रिपुरा में ईसाई संगठनों द्वारा हिन्दुओं के नरसंहारों की चिंता क्यों नहीं होती? इससे भी बडे दुर्भाग्य का विषय यह है कि भारत के किसी सैक्युलर नेता नें अमेरिका को धमकाकर यह नहीं कहा कि उसको भारत के आन्तरिक मामलों में दखल देने का अधिकार नहीं है। भारत के मुस्लिम और ईसाई संगठनों नें इसका स्वागत किया है। इससे उनकी भारतबाह्य निष्ठा स्पष्ट होती है। इस बदनाम आयोग की रिपोर्ट के तुरन्त बाद इस विधेयक को सार्वजनिक करना, ऐसा लगता मानों ये दोनों एक ही जंजीर की दो कडिया हैं।

राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के गलत इरादों का पता इसी बात से लगता है कि इन्होंनें साम्प्रदायिक दंगों के कारणों का विश्लेषण भी नहीं किया। ड्राफ्ट समिति की सदस्य अनु आगा ने अप्रैल ,2002 में कहा था, यदि अल्पसंख्यकों को पहले से ही तुष्टीकरण और अनावश्यक छूटें दी गई हैं तो उस पर पुनर्विचार करना चाहिये। यदि ये सब बातें बहुसंख्यकों के खिलाफ गई हैं तो उनको वापस लेने का साहस होना चाहिये। इस विषय पर सार्वजनिक बहस होनी चाहिये।’(इन्डियन एक्स., 8 अप्रैल,2002) इन नौ वर्षों में अनु आगा ने इस विषय में कुछ नहीं किया। शायद उन्हें मालूम चल गया था कि यदि सत्य सामने आ गया तो ऐसा अधिनियम बनाना पडेगा जो प्रस्तावित अधिनियम के बिल्कुल विपरीत होगा।

यह अधिनियम विदेशी शक्तियों के इशारे पर ही लाया गया है। ऐसा लगता है कि एक अन्तर्राष्ट्रीय षडयंत्र के आधार पर हिन्दू समाज, हिन्दू संगठनों और हिन्दू नेताओं को शिकंजे में कसने का प्रयास किया जा रहा है।

इस विधेयक के कुछ खतरनाक प्रावधान निम्नलिखित हैं -

1. यह विधेयक साम्प्रदायिक हिंसा के अपराधियों को अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक के आधार पर बांटने का अपराध करता है। किसी भी सभ्य समाज या सभी राष्ट्र में यह वर्गीकरण स्वीकार्य नहीं होता। अभी तक यही लोग कहते थे कि अपराधी का कोई धर्म नहीं होता। अब इस विधेयक में क्यों साम्प्रदायिक हिंसा के अल्पसंख्यक अपराधियों को दंड से मुक्त रखा गया है? प्रस्तावित विधेयक का अनुच्छेद 8 अल्प्संख्यकों के विरुद्ध घृणा का प्रचार अपराध मानता है। परन्तु हिन्दुओं के विरुद्ध इनके नेता और संगठन खुले आम दुष्प्रचार करते हैं। इस विधेयक में उनको अपराधी नहीं माना गया है। इनका मानना है कि अल्पसंख्यक समाज का कोई भी व्यक्ति साम्प्रदायिक तनाव या हिंसा के लिये दोषी नहीं है। वास्तविकता ठीक इसके विपरीत है। भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व में इनके धार्मिक नेताओं के भाषण व लेखन अन्य धर्मावलम्बियों के विरुद्ध विषवमन करते हैं। भारत में भी कई न्यायिक निर्णयों और आयोगों की रिपोर्टों में इनके भाषणों और कृत्यों को ही साम्प्रदायिक तनाव के मूल में बताया गया है। ओडीसा और गुजरात की जिन घटनाओं का ये बार-बार प्रलाप करते हैं, उनके मूल में भी आयोगों और न्यायालयों नें अल्पसंख्यकों की हिंसा को पाया है। मूल अपराध को छोडकर प्रतिक्रिया वाले को ही दंडित करना न केवल देश के कानून के विपरीत है अपितु किसी भी सभ्य समाज की मान्यताओं के खिलाफ है।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में कथित अल्पसंख्यक समाज द्वारा हिंदू समाज पर 1,50,000 से अधिक हमले हुए हैं तथा हिन्दुओं के मंदिरों पर लगभग ५०० बार हमले हुए हैं। २०१० में बंगाल के देगंगा में हिंदुओं पर किये गये अत्याचारों को देखकर यह नहीं लगता कि यह भारत का कोई भाग है। बरेली और अलीगढ में हिन्दू समाज पर हुऍ हमले ज्यादा पुराने नहीं हुए हैं। एक विदेशी पत्रकार द्वारा विदेश में ही पैगम्बर साहब के कार्टून बनाने पर भारत में कई स्थानों पर हिन्दुओं पर हमले किसी से छिपे नहीं हैं। अपराधी को छोडना और पीडित को ही जिम्मेदार मानना क्या किसी भी प्रकार से उचित माना जा सकता है? एक अन्य सैक्युलर नेता,सैम राजप्पा ने लिखा है, आज जबकि देश साम्प्रदायिक हिंसा से मुक्ति चाहता है, यह अधिनियम मानकर चलता है कि साम्प्रदायिक दंगे बहुसंख्यक के द्वारा होते हैं और उनको ही सजा मिलनी चाहिये। यह बहुत भेदभावपूर्ण है। (दी स्टेट्समैन,६जून,२०११)

2. अनुच्छेद 7 के अनुसार यदि एक मुस्लिम महिला के साथ दुर्व्यवहार होता है तो वह अपराध है, परन्तु हिन्दू महिला के साथ किया गया बलात्कार अपराध नहीं है जबकि अधिकांश दंगों में हिन्दू महिला की इज्जत ही निशाने पर रहती है।

3. जिस समुदाय की रक्षा के बहाने से इस शैतानी विधेयक को लाया गया है, उसको इस विधेयक में” समूह” का नाम दिया है। इस समूह में कथित अल्पसंख्यकों के अतिरिक्त अनुसूचित जातियों और जनजातियों को भी शामिल किया गया है। क्या इन वर्गों में परस्पर संघर्ष नहीं होता? शिया-सुन्नी के परस्पर खूनी संघर्ष जगजाहिर हैं। इसमें किसकी जिम्मेदारी तय करेंगे? अनुसूचित जातियों के कई उपवर्गों में कई बार संघर्ष होते हैं,हालांकि इन संघर्षों के लिये अधिकांशतः ये सैक्युलर बिरादरी के लोग ही जिम्मेदार होते हैं। इन सबका यह मानना है कि उनकी समस्याओं का समाधान हिंदू समाज का अविभाज्य अंग बने रहने में ही हो सकता है। यह देश की अखण्डता और हिन्दू समाज को भी विभक्त करने का षडयंत्र है। इन दंगों की रोकथाम क्या इस अधिनियम से हो पायेगी? इन संघर्षों को रोकने के लिये जिस सदभाव की आवश्यक्ता होती है, इस कानून के बाद तो उसकी धज्जियां ही उधडने वाली हैं।

4. इस विधेयक में बहुसंख्यक हिन्दू समाज को कट्घरे में खडा किया गया है। सोनिया को ध्यान रखना चाहिये कि हिन्दू समाज की सहिष्णुता की इन्होनें कई बार तारीफ की है। कांग्रेस के एक अधिवेशन में इन्होनें कहा था कि भारत में हिन्दू समाज के कारण ही सैक्युलरिज्म जिंदा है और जब तक हिन्दू रहेगा भारत सैक्युलर रहेगा। विश्व में जिसको भी प्रताडित किया गया, उसको हिंदू नें शरण दी है। जब यहूदियों, पारसियों और सीरियन ईसाइयों को अपनी ही जन्मभूमि में प्रताडित किया गया था तब हिन्दू ने ही इनको शरण दी थी। अब उसी हिन्दू को निशाना बनाने की जगह साम्प्रदायिक तनावों के मूल को समझना चाहिये। सोनिया को वोट बैंक की चिंता छोडकर देशहित का विचार करना चाहिये। यदि ये सहिष्णु हिन्दू समाज को एक नरभक्षी दानव के रूप में दिखायेंगे तो साम्प्रदायिक वैमनस्य की खाई और चौडी हो जायेगी जिसे कोई नहीं पाट सकेगा। सलाहकार परिषद के ही एक सदस्य, एन.सी. सक्सेना ने कहा था, यदि अल्पसंख्यक समुदाय के किसी व्यक्ति द्वारा बहुसंख्यक समाज के किसी व्यक्ति पर अत्याचार होता है तो यह विषय भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत आयेगा, प्रस्तावित अधिनियम में नहीं। (दी पायनीयर,23 जून,2011) इस कानून का संरक्षण केवल बहुसंख्यक समाज के लिये नहीं , अल्पसंख्यक समाज के लिये भी है। फिर इस अधिनियम की आवश्यक्ता ही क्या है? क्या इससे उनके इरादों का पर्दाफाश नहीं हो जाता?

5.इस विधेयक में साम्प्रदायिक हिंसा की परिभाषा दी है, वह कृत्य जो भारत के सैक्युलर ताने बाने को तोडेगा। भारत में सैक्युलरिज्म की परिभाषा अलग-अलग है। भारतीय संविधान में या इस विधेयक में कहीं भी इसे परिभाषित नहीं किया गया। क्या अफजल गुरू को फांसी की सजा से बचाना,आजमगढ जाकर आतंकियों के हौंसले बढाना, बटला हाउस में पुलिस वालों के बलिदान को अपमानित कर आतंकियों की हिम्मत बढाना,मुम्बई  हमले में बलिदान हुए लोगों के बलिदान पर प्रश्नचिंह लगाना, मदरसों में आतंकवाद के प्रशिक्षण को बढावा देना, बंग्लादेशी घुसपैठियों को बढावा देना सोनिया की निगाहों में सैक्युलरिज्म है और इनके विरुद्ध आवाज उठाना सैक्युलर ताने-बाने को तोडना? ये लोग सैक्युलरिज्म की मनमानी परिभाषा देकर क्या देशभक्तों को प्रताडित करना चाहते हैं?

6.विधेयक के उपबंध 74 के अनुसार यदि किसी व्यक्ति के ऊपर घृणा सम्बन्धी प्रचार या साम्प्रदायिक हिंसा का आरोप है तो उसे तब तक दोषी माना जायेगा जब तक कि वह निर्दोष सिद्ध न हो जाये। यह उपबंध संविधान की मूल भावना के विपरीत है। भारत का संविधान कहता है कि जब तक अपराध सिद्ध न हो जाये तब तक आरोपी निर्दोष माना जाये। यदि यह विधेयक पास हो जाता है तो किसी को भी जेल में भेजने के लिये उस पर केवल आरोप लगाना पर्याप्त रहेगा। उसके लिये अपने आप को निर्दोष सिद्ध करना कठिन ही नहीं असम्भव हो जायेगा। इस विधेयक में यह भी प्रावधान है कि अगर किसी हिन्दू के किसी व्यवहार से उसे मानसिक कष्ट हुआ है तो वह भी प्रताडना की श्रेणी में आयेगा। इसका अर्थ है कि अब किसी अल्पसंख्यक नेता के कुकृत्य या देश विरोधी काम के बारे में नहीं कहा जा सकता।

7.यदि किसी राज्य के कर्मचारी के विरुद्ध इस प्रकार का आरोप है तो उसके लिये उस राज्य का मुख्यमंत्री भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है क्योंकि वह उसे नहीं रोक सका है। इसका अर्थ है कि अब झूठी गवाही के आधार पर किसी भी विरोधी पक्ष के मुख्यमंत्री को फंसाना अब ज्यादा आसान हो जायेगा। जो मुख्यमंत्री अब तक इनके जाल में नहीं फंस पा रहे थे, अब उनके लिये जाल बिछाना ज्यादा आसान हो जायेगा।

8. यदि किसी संगठन का कोई कार्यकर्ता आरोपित है तो उस संगठन का मुखिया भी जिम्मेदार होगा क्योंकि वह भी इस अपराध में शामिल माना जायेगा। अब ये लोग किसी भी हिंदू संगठन व उनके नेताओं को आसानी से जकड सकेंगे। कसर अब भी नहीं छोड रहे परन्तु अब वे अधिक मजबूती से इन पर रोक लगा कर मनमानी कर सकेंगे।

9. यदि दुर्भाग्य से यह विधेयक पास हो जाता है तो राज्य सरकार के अधिकारों को केन्द्र सरकार आसानी के साथ हडप सकती है। कानून व्यवस्था राज्य सरकार का विषय होती है। केन्द्र सरकार ऐसे विषयों पर सलाह दे सकती है या “एड्वाइजरी” जारी कर सकती है। इससे भारत का संघीय ढांचा सुरक्षित रहता है। परन्तु अब संगठित साम्प्रदायिक और किसी सम्प्रदाय को लक्ष्य बनाकर की जाने वाली हिंसा राज्य के भीतर आंतरिक उपद्रव के रूप में देखी जायेगी। पहले केन्द्र सरकार की मंशा अनुच्छेद ३५५ का उपयोग कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की थी। परन्तु अब इस कदम को वापस लेकर वे राजनीतिक दलों के विरोध की धार को कुंद करना चाहते हैं। परन्तु इनके राज्य सरकारों को कुचलने के इरादों में कोई कमी नहीं आयी है।

10. प्रस्तावित अधिनियम में निगरानी व निर्णय लेने के लिये जिस प्राधिकरण का प्रावधान है उसमें ७ सदस्य होंगे। अध्यक्ष, उपाध्यक्ष समेत इन 7 में से 4 सदस्य अल्पसंख्यक वर्ग के होंगे। क्या इससे परस्पर अविश्वास नहीं बढेगा? इसका मतलब यह स्पष्ट है कि हर व्यक्ति ,चाहे किसी भी पद पर हो, केवल अपने समुदाय की चिंता करता है। इस चिंतन का परिणाम क्या होगा इस पर देश को अवश्य विचार करना होगा। किसी न्यायिक प्राधिकरण का साम्प्तदायिक आधार पर विभाजन देश को किस ओर ले जायेगा?

11. इस प्राधिकरण को असीमित अधिकार दिये गये हैं। ये न केवल पुलिस व सशस्त्र बलों को सीधे निर्देश दे सकते हैं अपितु इनके सामने दी गई गवाही न्यायालय के सामने दी गई गवाही मानी जायेगी। इसका अर्थ है कि तीस्ता जैसी झूठे गवाह तैय्यार करने वाली अब अधिक खुल कर अपने षडयंत्रों को अन्जाम दे सकेंगी।

12. अनुच्छेद 13 सरकारी कर्मचारियों पर इस प्रकार शिकन्जा कसता है कि वे मजबूरन अल्पसंख्यकों का साथ देने के लिये मजबूर होंगे चाहे वे ही अपराधी क्यों न हों।

13.यदि यह विधेयक लागू हो जाता है तो किसी भी अल्पसंख्यक व्यक्ति के लिये किसी भी बहुसंख्यक को फंसाना बहुत आसान हो जायेगा। वह केवल पुलिस में शिकायत दर्ज करायेगा और पुलिस अधिकारी को उस हिन्दु को बिना किसी आधार के भी गिरफ्तार करना पडेगा। वह हिन्दू किसी सबूत की मांग नहीं कर सकता क्योंकि अब उसे ही अपने को निरपराध सिद्ध करना है। वह शिकायतकर्ता का नाम भी नहीं पूछ सकता। अब पुलिस अधिकारी को ही इस मामले की प्रगति की जानकारी शिकायतकर्ता को देनी है जैसे कि वह उसका अधिकारी हो। शिकायतकर्ता अगर यह कहता है कि आरोपी के किसी व्यवहार, कार्य या इशारे से वह मानसिक रूप से पीडित हुआ है तो भी आरोपी दोषी माना जायेगा। इसका अर्थ है कि अब कोई भी किसी मौलवी या किसी पादरी के द्वारा किये गये किसी दुष्प्रचार की शिकायत भी नहिं कर सकेगा न ही वह उनके किसी घृणास्पद साहित्य का विरोध कर सकेगा।

14. इस विधेयक के अनुसार अब पुलिस अधिकारी के पास असीमित अधिकार होंगे। वह जब  चाहे आरोपी हिन्दू के घर की तलाशी ले सकता है। यह अन्ग्रेजों के द्वारा लाये गये कुख्यात रोलेट एक्ट से भी खतरनाक सिद्ध हो सकता है।

15.इस विधेयक की धारा 81 में कहा गया है कि ऐसे मामलों नियुक्त विशेष न्यायाधीश किसी अभियुक्त के ट्रायल के लिये उसके समक्ष प्रस्तुत किये बिना भी उसका संज्ञान ले सकेगा और उसकी संपत्ति को भी जब्त कर सकेगा।

16.किसी अल्पसंख्यक के व्यापार में बाधा डालना भी इसमें अपराध है। यदि कोई मुसलमान किसी हिंदू की सम्पत्ति को खरीदना चाहता है और वह हिंदू मना करता है तो इसमें वह अपराध बन जायेगा।

17.अब हिन्दू को इस अधिनियम में इस कदर कस दिया जायेगा कि उसको अपने बचाव का एक ही रास्ता दिखाई देगा कि वह धर्मांतरण को मजबूर हो जायेगा। इसके कारण धर्मांतरण की गतिविधियों में जबर्दस्त तेजी आयेगी।
इस विधेयक के कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों का ही विश्लेषण किया जा सका है। जैसा चित्र अभी तक सामने आया है यदि यह पास हो जाता है तो परिस्थिती और भी भयावह होगी। आपात काल में किये गये मनमानीपूर्ण निर्णय भी फीके पड जायेंगे। हिन्दू का हिन्दू के रूप में रहना और भी मुश्किल हो जायेगा। मनमोहन सिंह ने पहले ही कहा था कि देश के संसाधनों पर मुसलमानों का पहला अधिकार है। यह विधेयक इस कथन का नया संस्करण है। इस विधेयक के विरोध में एक सशक्त आंदोलन खडा करना पडेगा तभी इस तानाशाहीपूर्ण कदम पर रोक लगाई जा सकती है।

Saturday, 23 July 2011

पंथनिरपेक्ष ढांचे पर प्रहार

ए. सूर्यप्रकाश
अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के अपने एजेंडे पर प्रतिबद्ध संप्रग सरकार एक ऐसा कानून बनाने जा रही है जो सांप्रदायिक सौहार्द को नष्ट-भ्रष्ट कर सकता है, संविधान की संघीय विशेषताओं को कमजोर कर सकता है और केंद्र सरकार को राज्यों के शासन में दखल देने के नए बहाने उपलब्ध करा सकता है। प्रस्तावित विधेयक को सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा रोकथाम बिल नाम दिया गया है और इसका जो उद्देश्य बताया जा रहा है वह सांप्रदायिक संघर्ष की घटनाओं पर अंकुश लगाना, लेकिन इसका निर्माण इस पूर्वाग्रह के साथ किया गया है कि सभी स्थितियों में धार्मिक बहुसंख्यक ही अल्पसंख्यक समुदाय पर जुल्म करता है। लिहाजा बहुसंख्यक समाज के सदस्य दोषी हैं और अल्पसंख्यक समुदाय के लोग पीडि़त। चूंकि यही धारणा इस कानून का आधार है इसलिए यह स्वाभाविक है कि प्रस्तावित कानून 35 राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों में से 28 में बहुसंख्यक हिंदुओं को सांप्रदायिक हिंसा के लिए जिम्मेदार मानता है और मुस्लिम, ईसाई तथा अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को पीडि़त के रूप में देखता है। 

इस कानून का मसौदा उस राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने तैयार किया है जो छद्म सेक्युलरिस्टों, हिंदू विरोधियों और नेहरू-गांधी परिवार के समर्थकों का एक समूह है और कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी जिसकी अध्यक्ष हैं। इस परिषद को केंद्र की एक ऐसी सरकार से बराबर महत्व मिल रहा है, जिसका नेतृत्व पहली बार अल्पसंख्यक समाज के एक सदस्य द्वारा किया जा रहा है। इस प्रस्तावित कानून के प्रावधान ऐसे हैं कि यह सांप्रदायिक सौहार्द को प्रोत्साहन देना तो दूर रहा, हिंदुओं के बीच पंथनिरपेक्षता की प्रतिबद्धता को ही कमजोर कर सकता है। 

विधेयक के मसौदे के अनुसार यदि किसी समूह की सदस्यता के कारण जानबूझकर किसी व्यक्ति के खिलाफ ऐसा कृत्य किया जाए जो राष्ट्र के सेक्युलर ताने-बाने को नष्ट करने वाला हो..। सबसे बड़ी शरारत शब्द समूह की परिभाषा में की गई है। इसमें कहा गया है कि समूह का तात्पर्य भारत के किसी राज्य में धार्मिक अथवा भाषाई अल्पसंख्यक या अनुसूचित जाति अथवा जनजाति से है। इसका अर्थ है कि हिंदू, जो आज ज्यादातर राज्यों में बहुसंख्यक हैं, इस कानून के तहत समूह के दायरे में नहीं आएंगे। लिहाजा उन्हें इस कानून के तहत संरक्षण नहीं मिल सकेगा, भले ही वे मुस्लिम अथवा ईसाई सांप्रदायिकता, घृणा या हिंसा के शिकार हों। अनेक विश्लेषकों ने कहा भी है कि इसका अर्थ है कि यदि 2002 में यह कानून लागू होता तो जिन 59 हिंदुओं को गुजरात के गोधरा स्टेशन में साबरमती स्टेशन में जलाकर मार दिया गया उनकी हत्या के संदर्भ में एफआइआर दर्ज नहीं कराई जा सकती थी, क्योंकि इस कानून के तहत गुजरात में हिंदू बहुसंख्यक हैं, लेकिन मुस्लिम गोधरा बाद के दंगों के लिए इस कानून के प्रावधानों का इस्तेमाल कर सकते थे। इसका सीधा अर्थ है कि सांप्रदायिक हिंसा का शिकार होने वाले हिंदुओं को दोयम दर्जे के नागरिक के रूप में देखा जाएगा और यह काफी कुछ पाकिस्तान जैसे इस्लामिक राज्य में लागू हिंदू विरोधी कानूनों की तरह है। 

प्रस्तावित कानून के मसौदे के अनुसार एक पीडि़त की व्याख्या अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्य के रूप में की गई है, जिसे सांप्रदायिक हिंसा की घटना में शारीरिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक और आर्थिक क्षति पहुंची हो या उसकी संपत्ति को नुकसान हुआ हो। इसके दायरे में उसके संबंधी, कानूनी अभिभावक और उत्तराधिकारी भी शामिल हैं। इस व्याख्या के आधार पर देश के किसी हिस्से में कोई मुस्लिम या ईसाई का यदि किसी सामान्य मुद्दे पर अपने हिंदू पड़ोसी से विवाद होगा तो वह इस कानून का इस्तेमाल कर अपने पड़ोसी पर यह आरोप लगा सकता है कि उसने उसे मनोवैज्ञानिक नुकसान पहुंचाया है। यदि वह किसी कारण ऐसा न करे तो उसके संबंधी ऐसा कर सकते हैं। 

इस पूरी कवायद का जो बुनियादी मकसद नजर आता है वह है हिंदुओं को निशाना बनाना। विधेयक कहता है कि इसे पूरे भारत में लागू किया जाएगा, लेकिन जब देश के एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य जम्मू-कश्मीर की बात आती है तो इसमें कहा गया है कि केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर राज्य की सहमति से इसे वहां लागू कर सकती है। 

यद्यपि इस विधेयक को इस तरह अंतिम रूप दिया गया है कि हिंदू समुदाय इसके विचित्र प्रावधानों की मार झेले, लेकिन मुस्लिम, ईसाई और सिखों को भी परेशानी झेलनी पड़ सकती है, क्योंकि बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक के निर्धारण के लिए राज्य ही इकाई है। 2001 के जनगणना आंकड़ों के मुताबिक सिख पंजाब में 59.9 प्रतिशत हैं, जबकि हिंदुओं की आबादी 36.9 प्रतिशत है। यदि यह कानून लागू हो जाता है तो बहुसंख्यक सिख समाज को हिंदुओं की शिकायत पर परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। इसी तरह ईसाई तीन राज्यों-नागालैंड (90 प्रतिशत), मिजोरम (87 प्रतिशत) और मेघालय (70.30 प्रतिशत) में बहुसंख्यक हैं। यदि इन राज्यों में हिंदुओं ने इस कानून का मनमाना इस्तेमाल शुरू कर दिया तो ईसाई समाज को मुसीबतें उठानी पड़ सकती हैं। लिहाजा मुस्लिम, ईसाई और सिख समुदाय को कांग्रेस पार्टी के इस दावे पर कदापि भरोसा नहीं करना चाहिए कि यह विधेयक पंथनिरपेक्षता को मजबूत करेगा, क्योंकि यह विधेयक सांप्रदायिक हिंसा और घृणा के सभी दोषियों को बराबरी पर नहीं देखता। 

प्रत्येक राज्य में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के निर्धारण में एक अन्य विसंगति भी है। मणिपुर में 46 प्रतिशत हिंदू हैं और अरुणाचल प्रदेश में 34.60 प्रतिशत। चूंकि इन राज्यों में किसी धार्मिक समूह के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है लिहाजा किसे पीडि़त माना जाएगा और किसे दोषी? इसके अतिरिक्त यदि अनुसूचित जाति और जनजाति को हिंदू समुदाय से अलग कर दिया जाए तो इन राज्यों में हिंदू आबादी का प्रतिशत क्या होगा? केरल का मामला भी है, जहां 56.20 प्रतिशत हिंदू हैं। अगर इससे 22 प्रतिशत अनुसूचित जाति और जनजाति को अलग कर दिया जाए तो हिंदुओं का प्रतिशत क्या होगा? यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि जो कानून बनाया जा रहा है वह दरअसल सांप्रदायिक भी है और एक समुदाय यानी हिंदुओं को निशाना बनाने वाला भी। अगर इस विधेयक के सूत्रधार अपने मंसूबे में सफल रहे तो भारत की एकता और अखंडता खतरे में पड़ जाएगी। ऐसा विधेयक वह व्यक्ति नहीं बना सकता जो लोकतांत्रिक और पंथनिरपेक्ष भारत से प्यार करता है। हमें इसकी जांच करनी चाहिए कि विधेयक का मूल मसौदा कहां से आया है? (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

Friday, 22 July 2011

एक और विभाजन की तैयारी

राजीव गुप्ता
यूनान मिस्र रोमां सब मिट गए जहां से
बाकी अभी तलक है नामों-निशा हमारा !
कुछ बात है ऐसी कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौरें जहां हमारा  !!


भारत में इन पंक्तियों को भला किसने नहीं सुना होगा ? इतिहास साक्षी है कि भारत ने बहुतेरे आताताइयों के आक्रमणों को न केवल झेला है अपितु समय-समय पर उसका मुंहतोड़ जबाब भी दिया है. लेकिन ये आताताई कभी भी अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो पाए. उन्होंने हमें मजहब, ऊँच-नीच, भेदभाव, रीतिरिवाज, आदि के नाम पर आपस में खूब लड़ाने की कोशिश की परन्तु बहुत ज्यादा सफल नहीं हो पाए. क्योंकि अगर हमारे समाज ने उनका प्रतिकार किया तो उसका मूल कारण यह था कि हमारे  यहाँ मतभेद तो था परन्तु कभी मनभेद नहीं रहा. यही भारतीय संस्कृति की परिणीति रही है. समय-समय पर शासकों  की  भौगोलिक सीमायें जरूर बदलती गयी परन्तु व्यक्ति कभी अपनी मूल भावना से नहीं भटका. देश में एकता रहे इसलिए आद्य गुरु शंकराचार्य जी ने अपनी दूरदर्शिता से देश में चार धामों की स्थापना की. और तो और महात्मा गांधी ने भी देश की एकता बनाये रखने के लिए भारत-पाकिस्तान के बटवारे के समय यहाँ तक कह दिया था कि दो मुल्कों का बटवारा मेरी लाश पर होगा. तात्पर्य यह है कि भारत के मनीषियों ने, सामाजिक चिंतकों ने हर संभव कोशिश की कि देश की एकता बनी रहे.
परन्तु वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार यूपीए-2 ने भारत को खंडित करने की लगभग पूरी तैयारी कर ली है. इस मानसून  सत्र में एक ऐसा विधेयक लाने जा रही है जो सामाजिक वैमनस्य के साथ समाज में विभेद तो पैदा करेगी ही, साथ ही दिलों को भी बाँट देगी जिससे कि समुदायों के बीच दूरियां बढ़ना लगभग तय हैं. इस विधेयक का नाम है “सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम (न्याय एवं क्षतिपूर्ति) विधेयक 2011“. पास होने के बाद यह अपने आप में एक ऐसा अभूतपूर्व कानून होगा जो देश के संविधान को भी ताक पर रख देगा, देश की एकता खतरे में पड़  जायेगी, और तो और यह भारत के संघीय ढांचे को ही नष्ट कर देगा और भारत में अंतर-सामुदायिक संबंधों में असंतुलन, असंतोष व रोष पैदा कर देगा. शुरू में तो विधेयक का प्रारूप देश में सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के प्रयास के तौर पर नजर आता है, किंतु इसका असली उद्देश्य इसके उलट है. राज्य सभा में नेता प्रतिपक्ष के लेख के अनुसार बिल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है ‘समूह’ की परिभाषा. समूह से तात्पर्य पंथिक या भाषायी अल्पसंख्यकों से है, जिसमें आज की स्थितियों के अनुरूप अनुसूचित जाति व जनजाति को भी शामिल किया जा सकता है. मसौदे के तहत दूसरे अध्याय  में नए अपराधों का एक पूरा व्यौरा  दिया गया है. सांप्रदायिक हिंसा के दौरान किए गए अपराध कानून एवं व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या होते हैं जो कि राज्यों के कार्यक्षेत्र में आता है. केंद्र को कानून एवं व्यवस्था के सवाल पर राज्य सरकार के कामकाज में दखलंदाजी का कोई अधिकार नहीं है. केंद्र सरकार का न्यायाधिकरण इसे सलाह, निर्देश देने और धारा 356 के तहत यह राय प्रकट करने तक सीमित करता है कि राज्य सरकार संविधान के अनुसार काम रही है या नहीं. यदि प्रस्तावित बिल कानून बन जाता है तो केंद्र सरकार राज्य सरकारों के अधिकारों को हड़प लेगी. इस विधेयक के द्वारा न केवल बहुसंख्यकों अर्थात हिंदुओं को आक्रामक और अपराधी वर्ग में ला खड़ा करने, बल्कि हिंदू-मुस्लिमों के बीच शत्रुता पैदा कर हर गली-कस्बे में दंगे करवाने की साजिश है.

अगर यह बाबर जैसा आतातायी और औरंगजेबी फरमान जैसा कानून की शक्ल लेता है तो किसी भी बहुसंख्यक (हिंदू) पर कोई भी अल्पसंख्यक (मुस्लिम, ईसाई या अन्य) नफरत फैलाने, हमला करने, साजिश करने अथवा नफरत फैलाने के लिए आर्थिक मदद देने या शत्रुता का भाव फैलाने के नाम पर मुकदमा दर्ज करवा सकेगा और उस बेचारे बहुसंख्यक (हिंदू) को इस कानून के तहत कभी शिकायतकर्ता अल्पसंख्यक (मुस्लिम, ईसाई या अन्य) की पहचान तक का हक नहीं होगा. इसमें शिकायतकर्ता के नाम और पते की जानकारी उस व्यक्ति को नहीं दी जाएगी जिसके खिलाफ शिकायत दर्ज की जा रही है. इसके साथ ही शिकायतकर्ता अल्पसंख्यक (मुस्लिम, ईसाई या अन्य) अपने घर बैठे शिकायत दर्ज करवा सकेगा. इसी प्रकार यौन शोषण व यौन अपराध के मामले भी केवल और केवल अल्पसंख्यक (मुस्लिम, ईसाई या अन्य) बहुसंख्यक (हिंदू) के विरुद्ध दर्ज करवा सकेगा और ये सभी मामले अनुसूचित जाति और जनजाति पर किए जाने वाले अपराधों के साथ समानांतर चलाए जाएंगे. इसका मतलब है कि संबंधित बहुसंख्यक (हिंदू) व्यक्ति को कभी यह नहीं बताया जाएगा कि उसके खिलाफ शिकायत किसने दर्ज कराई है ? इसके अलावा उसे एक ही तथाकथित अपराध के लिए दो बार दो अलग-अलग कानूनों के तहत दंडित किया जाएगा. यही नहीं, यह विधेयक पुलिस और सैनिक अफसरों के विरुद्ध उसी तरह बर्ताव करता है जिस तरह से कश्मीरी आतंकवादी और आइएसआइ उनके खिलाफ रुख अपनाते हैं. विधेयक में ‘समूह’ यानी अल्पसंख्यक (मुस्लिम, ईसाई या अन्य) के विरुद्ध किसी भी हमले या दंगे के समय यदि पुलिस, अ‌र्द्धसैनिक बल अथवा सेना तुरंत और प्रभावी ढंग से स्थिति पर नियंत्रण प्राप्त नहीं करती तो उस बल के नियंत्रणकर्ता अथवा प्रमुख के विरुद्ध आपराधिक धाराओं में मुकदमे चलाए जाएंगे. कुल मिलाकर हर स्थिति में पुलिस या अ‌र्द्धसैनिक बल के अफसरों को कठघरे में खड़ा होना होगा, क्योंकि स्थिति पर नियंत्रण जैसी परिस्थिति किसी भी ढंग से परिभाषित की जा सकती है. इस विधेयक की धाराएं किसी भी सभ्य, समान अधिकार संपन्न एवं भेदभावरहित गणतंत्र के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है.

इस विधेयक को बनाने वालों ने सांप्रदायिक हिंसा रोकने के लिए जिस सात सदस्यीय समिति के गठन की सिफारिश की है, उसमें चार सदस्य मजहबी अल्पसंख्यक होंगे. विधेयक मानकर चलता है कि यदि समिति में अल्पसंख्यकों  का बहुमत नहीं होगा तो समिति न्याय नहीं कर सकेगी. दंगो के दौरान होने वाले जान और माल के नुकसान पर मुआवजे के हक़दार सिर्फ अल्पसंख्यक ही होंगे। किसी बहुसंख्यक का भले ही दंगों में पूरा परिवार और संपत्ति नष्ट हो जाए उसे किसी तरह का मुआवजा नहीं मिलेगा. वह भीख मांग कर जीवन काट सकता है. हो सकता है सांप्रदायिक हिंसा भड़काने का दोषी सिद्ध कर उसके लिए जेल की कोठरी में व्यवस्था कर दी जाए.

एक संगठन ने इस मसले पर एक लेख निकाला है. उस लेख के अनुसार इस कानून के कुछ बिदुओं को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है यह दुर्भावना, पक्षपात एवं दुराग्रह से ग्रसित है. समाज के बहुसंख्यक वर्ग को इसके माध्यम से न केवल प्रताड़ना और अत्याचार का शिकार बनाया जा सकता है अपितु दोयम दर्जे के डरे हुए वातावरण में रहने के लिए बाध्य होना पड़ेगा. अतः समाज के लोगों को यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि वर्तमान सरकार अपने इस मसौदे से उन्हें क्या देना चाहती है ?

अधिनियम का प्रभाव क्षेत्र – इस अधिनियम की धारा 1 की उपधारा 2 के अनुसार इसका प्रभाव क्षेत्र सम्पूर्ण भारतवर्ष होगा. जम्मू-कश्मीर में राज्य की सहमति से इसे विस्तारित किया जायेगा. यह अधिनियम पारित किये जाने की तारीख से एक वर्ष के भीतर लागू होगा तथा एसे अपराध जो भारत के बाहर  किये गए है उन पर भी इस अधिनियम के उपबंधों के अंतर्गत उसी प्रकार कार्यवाही होगी जैसे वह भारत के भीतर किया गया हो. एक वर्ष के भीतर लागू किये जाने की बाध्यता को रखकर यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है कि वर्तमान सरकार और राष्ट्रीय सलाहकार समिति की वर्तमान अध्यक्षा के रहते ही यह कानून अनिवार्य रूप से लागू कर दिया जाय.

समूह – अधिनियम की धारा 3(F) के अंतर्गत दी गयी परिभाषा के अनुसार भारत संघ के किसी राज्य में कोई धार्मिक एवं भाषाई अल्पसंख्यक या भारत के संविधान के अनुच्छेद 366 खंड 24-25  के अंतर्गत अनुसूचित जातियां और अनुसूचित जान जातियां समूह के अंतर्गत आती है और इन्ही समूह पर किये गए अपराध के लिए यह कानून प्रभावी होता है. एक ज्वलंत उदाहरण से इसको समझने का प्रयास करते है कि वर्तमान एक राज्य गुजरात जिसकी विकास दर भारत के सभी राज्यों से सबसे अधिक है वहां कभी दो समुदायों के बीच एक दंगा होता है, जो कि अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा शुरू किया गया था इसके साक्षी हममे से बहुत लोग होंगे. अब प्रश्न यह  उठता है कि समूह के अंतर्गत समाविष्ट किये गए धार्मिक अल्पसंख्यक क्या सांप्रदायिक या लक्षित हिंसा में सम्मिलित नहीं होते ? इस कानून की तो यही मान्यता है. इस कानून के अनुसार इस सुनियोजित कुकृत्य में संलिप्त अल्पसंख्यक समुदाय के लोग जो समूह के अंतर्गत आते है अपराधी नहीं है, परन्तु इस घटना की स्वतः स्फूर्त प्रतिक्रिया में सम्मिलित बहुसंख्यक (हिन्दू) लोग अपराधी है. दूसरा प्रश्न यह उठता है कि यदि दो समूहों के बीच ही अगर सांप्रदायिक हिंसा हो जाय तो यह कानून किस प्रकार प्रभावी  होगा ?
सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा – इस अधिनियम की धारा 3 (C) के अनुसार जानबूझ कर किसी व्यक्ति के विरुद्ध किसी समूह की सदस्यता के आधार पर ऐसा कोई कार्य या कार्यों की श्रंखला जो चाहे सहज हो या योजनाबद्ध जिसके परिणाम स्वरुप व्यक्ति या सम्पति को क्षति या हानि पहुंचती हो.

किसी समूह के विरुद्ध शत्रुता का वातावरण – अधिनियम की धारा 3 (G ) के अनुसार अधिनियम में परिभाषित समूह के किसी व्यक्ति का समूह की सदयस्ता के आधार पर व्यापर या कारोबार का बहिष्कार या जीविका अर्जन करने में उसके लिए अन्यथा कठिनाई पैदा करना, तिरस्कार पूर्ण कार्य करना चाहे वह इस अधिनियम के अधीन अपराध हो या ना हो परन्तु जिसका प्रयोजन एवं प्रभाव भयपूर्ण शत्रुता या आपराधिक वातावरण उत्पन्न करना हो. यह ऐसे विषय है जिनको निश्चित कर सकना अत्यंत कठिन है. कोई व्यक्ति किस बात से अपने आपको शर्मिंदा अनुभव करेगा या उसे कौन सा कार्य भयपूर्ण लग सकता है यह निर्धारित कर पाना अत्यंत कठिन है. समूह के अतिरिक्त यदि किसी बहुसंख्यक को धर्म के नाम पर अपमानित किया जाता है या उसे व्यापार में अवरोध उत्पन्न किया जाता है तो समूह का व्यक्ति अपराधी नहीं मना जायेगा.

पीड़ित – इस अधिनियम के अनुसार पीड़ित वही व्यक्ति है जो किसी समूह का सदस्य है. समूह के बाहर किसी बहुसंख्यक की महिला से अगर दुराचार किया जाता है या अपमानित किया जाता है या जान-माल की हानि या क्षति पहुचाई जाती है तो भी बहुसंख्यक पुरुष या महिला पीड़ित नहीं माने जायेगे. परन्तु धारा 3 (J) के अनुसार अपराध के फलस्वरूप किसी समूह का कोई व्यक्ति शारीरिक, मानसिक मनोवैज्ञानिक या आर्थिक हानि उठाता है तो न केवल वह अपितु उसके रिश्ते-नातेदार, विधिक संरक्षक और विधिक वारिस भी पीड़ित माने जायेगे. मानसिक एवं मनोवैज्ञानिक हानि को मापने पा पैमाना क्या होगा यह स्पष्ट नहीं किया गया.


घृणा या दुष्प्रचार – अधिनियम की धारा 8 के अनुसार शब्दों द्वारा या बोले गए या लिखे गए या चित्रण किये गए किसी दृश्य को प्रकाशित, संप्रेषित या प्रचारित करना, जिससे किसी समूह या समूह के व्यक्तियों के विरुद्ध समानताय या विशिष्टतया हिंसा का खतरा होता है या कोई व्यक्ति इसी सूचना का प्रसारण या प्रचार करता है या कोई ऐसा विज्ञापन व सूचना प्रकाशित करता है जिसका अर्थ यह लगाया जा सकता हो कि इसमें घृणा को बढ़ावा देने या फ़ैलाने का आशय निहित है. उस समूह के व्यक्तियों के प्रति इसी घृणा उत्पन्न होने की सम्भावना के आधार पर वह व्यक्ति दुष्प्रचार का दोषी है. ऐसी प्रस्थिति में यदि कोई समाचार-पत्र आतंकवादियों के उन्माद भरे बयानों को प्रकाशित करता है तो उसका प्रकाशक अपराधी मना जायेगा. अर्थात फाँसी की सजा काट रहे आतंकवादियों का नाम प्रकाशित करने पर भी पाबंदी होगी. आतंकवाद के खिलाफ परिचर्चा, राष्ट्रीय सेमीनार का आयोजन करना भी अपराध माना जायेगा जो कि संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार को भी बाधित करेगा.


संगम,  सभा, या परिषद् – अधिनियम की धारा 3 (B) के अनुसार व्यक्तियों का ऐसा संगठन या समुच्चय जो पंजीकृत या निगमित हो या न हो.


अपराध  के लिए संगम, सभा, या परिषद् के वरिष्ठ अधिकारीयों का उत्तरदायित्व – धारा 15 (1) के अनुसार किसी संगम का कोई कार्यकर्त्ता या वरिष्ठतम अधिकारी या पद धारी अपनी कमान  के नियंत्रण पर्यवेक्षक के अधीन अधीनस्थों के ऊपर नियंत्रण रखने में असफल रहता है तो इस अधिनियम के अधीन यदि कोई अपराध किया जाता है तो वह अपने अधीनस्थों द्वारा किये गए अपराध का दोषी होगा. अर्थात किसी संगठन का सामान्य से सामान्य कार्यकर्त्ता भी इस अधिनियम के आधार पर यदि अपराधी सिद्ध होता है तो शीर्ष नेतृत्व भी अपराधी माना जायेगा.

सांप्रदायिक सामंजस्य, न्याय और क्षतिपूर्ति के लिए राष्ट्रीय प्राधिकरण – केंद्र सरकार इस अधिनियम के अधीन इसमें दी गयी शक्तियों का प्रयोग एवं कृत्यों का पालन करने हेतु ‘सांप्रदायिक सामंजस्य, न्याय और हानिपूर्ति राष्ट्रीय प्राधिकरण’ का गठन करेगी, जिसमे एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष और पांच अन्य सदस्य होंगे. यह प्राधिकरण स्वयं अपने आप में एक सांप्रदायिक निकाय होगा क्योंकि अधिनियम की धारा 21 (3) के अनुसार प्राधिकरण में अधिनियम में परिभाषित समूह के चार सदस्य अध्यक्ष और  उपाध्यक्ष सहित अनिवार्य रूप से होंगे. अतः समूह के सदस्य सदैव बहुमत में रहेंगे.



मुझे इतिहास में पढाया गया था कि भारत का विभाजन 1947  में धर्म के आधार पर हुआ था जिसकी बुनियाद कई वर्ष पहले ही बाहर से आये हमारे ऊपर हुकूमत करने वाले अंग्रेजों द्वारा फूट डालो और शासन करो के रूप में रखी जा चुकी थी. दो सम्प्रदायों के बीच इतनी कड़वाहट घोल दी गयी थी कि ट्रेनें लाशों से भरी हुई इधर-उधर आ जा रही थी. इससे लगभग हम सभी भालिभाँती विदित है. तो क्या इस मौजूदा सरकार ने भी एक और विभाजन की तैयारी मनभेद पैदा कर शुरू कर दी है ऐसा मान लिया जाय ?

(राजीव गुप्ता-vision2020rajeev@gmail.com)

Wednesday, 20 July 2011

साम्प्रदायिक और लक्षित हिंसा अधिनियम,2011- 21वीं शताब्दी का काला कानून

सोनिया जी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद द्वारा प्रस्तावित इस विधेयक को केन्द्रीय सरकार ने स्वीकार कर लिया है। इस विधेयक का उद्देश्य बताया गया है कि यह देश में साम्प्रदायिक हिंसा को रोकने में सहायक सिद्ध होगा। इसको अध्ययन करने पर ध्यान में आता है कि यदि दुर्भाग्य से यह पारित हो जाता है तो इसके परिणाम केवल विपरीत ही नहीं होंगे अपितु देश में साम्प्रदायिक विद्वेष की खाई इतनी चौडी हो जायेगी जिसको पाटना असम्भव हो जायेगा।यहां तक कि एक प्रमुख सैक्युलरिस्ट पत्रकार,शेखर गुप्रा ने भी स्वीकार किया है कि,”इस बिल से समाज का साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण होगा। इसका लक्ष्य अल्पसंख्यकों के वोट बैंक को मजबूत करने के अलावा हिन्दू संगठनों और हिंदू नेताओं का दमन करना है।
जिस प्रकार सरकार की रुचि भ्रष्टाचार को समाप्त करने की जगह भ्रष्टाचार को संरक्षण देकर उसके विरुद्ध आवाज उठाने वालों के दमन में है, उसी प्रकार यह सरकार साम्प्रदायिक हिंसा को रोकने की जगह हिंसा करने वालों को संरक्षण और उनके विरुद्ध आवाज उठाने वाले हिंदू संगठनों और उनके नेताओं को इसके माध्यम से कुचलना चाहती है। इस अधिनियम के माध्यम से केन्द्र राज्य सरकारों के कार्यों में हस्तक्षेप कर देश के संघीय ढांचे को ध्वस्त कर देगा। यह भारतीय संविधान की मूल भावना को तहस-नहस करता हुआ भी दिखाई दे रहा है। यह अधिनियम एक नई तानाशाही को तो जन्म देगा ही, यह हिन्दू समाज की भावनाओं और उनको वाणी देने वाले हिन्दू संगठनों को भी कुचल देगा।
जिस राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की अनुशंसा(आदेश) पर इस विधेयक को लाया जा रहा है, वह एक समानांतर सरकार की तरह काम कर रही है। यह न तो एक चुनी हुई संस्था है और न ही इसके सभी सदस्य जनता के द्वारा चुने गये प्रतिनिधी हैं। सरकार जो तर्क “सिविल सोसाईटी” या अन्य जन संगठनों के विरुद्ध प्रयोग करती है, वह स्वयं उस के विपरीत आचरण कर रही है।
NAC एक असंवैधानिक महाशक्ति है जो बिना किसी जवाबदेही के सलाह की आड में आदेश देती है। केन्द्र सरकार दासत्व भाव से उनके आदेशों को लागू करने के लिये हमेशा ही तत्पर रहती है। जिस ड्राफ्ट कमेटी ने इस विधेयक को बनाया है, उसके सदस्यों के चरित्र का विचार करते ही उनकी नीयत के बारे में किसी संदेह की गुंजाइश नहीं रहती है। इस समिती में ९ सद्स्य और उनके ४ सलाहकार हैं । इन सब में समानता के यही बिंदू है कि ये सभी हिंदू संगठनों के घोर विरोधी हैं , हमेशा गुजरात के हिन्दू समाज को कटघरे में खडा करने के लिये तत्पर रहते हैं और अल्पसंख्यकों के हितों का एकमात्र संरक्षक दिखने के लिये देश को भी बदनाम करने में संकोच नहीं करते।
हर्ष मंडेर रामजन्मभूमि आन्दोलन और हिन्दू संगठनों के घोर विरोधी हैं। अनु आगा जो कि एक सफल व्यवसायिक महिला हैं, गुजरात में मुस्लिम समाज को उकसाने के कारण ही एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में पहचानी जाती । तीस्ता सीतलवाड और फराह नकवी की गुजरात में भूमिका सर्वविदित है। उन्होंने न केवल झूठे गवाह तैय्यार किये हैं अपितु देश विरोधियों से अकूत धनराशी प्राप्त कर झूठे मुकदमे दायर किये हैं और जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने का संविधान विरोधी दुष्कृत्य किया है। आज इनके षडयंत्रों का पर्दाफाश हो चुका है, ये स्वयं न्याय के कटघरे में कभी भी खडे हो सकते हैं। ये लोग अपनी खीज मिटाने के लिये किसी भी सीमा तक जा सकते हैं।
जो काम वे न्यायपालिका के माध्यम से नहीं कर सके ,ऐसा लगता है वे इस विधेयक के माध्यम से करना चाहते हैं। एक प्रकार से इन्होनें अपने कुत्सित इरादों को पूरा करने के लिये चोर दरवाजे का प्रयोग किया है। इनके घोषित-अघोषित सलाहकारों के नाम इनका भंडाफोड करने के लिये पर्याप्त हैं।” मुस्लिम इन्डिया” चलाने वाले सैय्यद शहाबुद्दीन, धर्मान्तरण करने के लिये विदेशों में भारत को बदनाम करने वाले जोन दयाल , हिन्दू देवी-देवताओं का खुला अपमान करने वाली शबनम हाशमी और नियाज फारुखी जिस समिती के सलाहकार हों , वह कैसा विधेयक बना सकते हैं इसका अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है।
भारत के बडबोले मंत्री, कपिल सिब्बल द्वारा इस अधिनियम को सार्वजनिक करते हुए गुजरात के दंगों और उनमें सरकार की कथित भूमिका का उल्लेख करना सरकार की नीयत को स्पष्ट करता है। ऐसा लगता है कि सारी सैक्युलर ब्रिगेड मिलकर जो काम नहीं कर सकी, उसे सोनिया जी इस विधेयक के माध्यम से पूरा करना चाहती हैं। गुजरात के संदर्भ में सभी कसरतें व्यर्थ जा रही हैं। आरोप लगाने वाले स्वयं आरोपित बनते जा रहे हैं। कानून के शिकंजे में फंसने की दहशत से वे मरे जा रहे हैं। इस अधिनियम का प्रारूप देखने से ऐसा लगता है मानो उन्हीं चोट खाये इन तथाकथित मानवाधिकारवादी ने इसको बनाने के लिये अपनी कलम चलाई है।
इस विधेयक को सार्वजनिक करने का समय बहुत महत्वपूर्ण है। कुछ दिन पूर्व ही अमेरिका के ईसाईयत के प्रचार के लिये बदनाम “अंतर्राष्ट्रीय धर्म स्वातंत्र्य आयोग” ने भारत को अपनी निगरानी सूची में रखा है। उन्होंनें भी गुजरात और ओडीसा के उदाहरण दिये हैं। मानवाधिकारों के सम्बंध में अमेरिका का दोगलापन जगजाहिर है। इस आयोग को चिंता है ओडिसा और गुजरात की घटनाओं की, परन्तु उसको कश्मीर के हिन्दुओं या मणिपुर और त्रिपुरा में ईसाई संगठनों द्वारा हिन्दुओं के नरसंहारों की चिंता क्यों नहीं होती? इससे भी बडे दुर्भाग्य का विषय यह है कि भारत के किसी सैक्युलर नेता नें अमेरिका को धमकाकर यह नहीं कहा कि उसको भारत के आन्तरिक मामलों में दखल देने का अधिकार नहीं है। भारत के मुस्लिम और ईसाई संगठनों नें इसका स्वागत किया है। इससे उनकी भारतबाह्य निष्ठा स्पष्ट होती है। इस बदनाम आयोग की रिपोर्ट के तुरन्त बाद इस विधेयक को सार्वजनिक करना, ऐसा लगता मानों ये दोनों एक ही जंजीर की दो कडिया हैं। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के गलत इरादों का पता इसी बात से लगता है कि इन्होंनें साम्प्रदायिक दंगों के कारणों का विश्लेषण भी नहीं किया। ड्राफ्ट समिति की स्दस्य अनु आगा ने अप्रैल ,२००२ में कहा था,” यदि अल्पसंख्यकों को पहले से ही तुष्टीकरण और अनावश्यक छूटें दी गई हैं तो उस पर पुनर्विचार करना चाहिये। यदि ये सब बातें बहुसंख्यकों के खिलाफ गई हैं तो उनको वापस लेने का साहस होना चाहिये। इस विषय पर सार्वजनिक बहस होनी चाहिये।’(इन्डियन एक्स.,८ अप्रैल,२००२) इन नौ वर्षों में अनु आगा ने इस विषय में कुछ नहीं किया। शायद उन्हें मालूम चल गया था कि यदि सत्य सामने आ गया तो ऐसा अधिनियम बनाना पडेगा जो प्रस्तावित अधिनियम के बिल्कुल विपरीत होगा।
यह अधिनियम विदेशी शक्तियों के इशारे पर ही लाया गया है। ऐसा लगता है कि एक अन्तर्राष्ट्रीय षडयंत्र के आधार पर हिन्दू समाज, हिन्दू संगठनों और हिन्दू नेताओं को शिकंजे में कसने का प्रयास किया जा रहा है।
इस विधेयक के कुछ खतरनाक प्रावधान निम्नलिखित हैंः
१. यह विधेयक साम्प्रदायिक हिंसा के अपराधियों को अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक के आधार पर बांटने का अपराध करता है। किसी भी सभ्य समाज में यह वर्गीकरण स्वीकार्य नहीं होता। अभी तक यही लोग कहते थे कि अपराधी का कोई धर्म नहीं होता। अब इस विधेयक में क्यों साम्प्रदायिक हिंसा के अल्पसंख्यक अपराधियों को दंड से मुक्त रखा गया है? प्रस्तावित विधेयक का अनुच्छेद ८ अल्प्संख्यकों के विरुद्ध घृणा का प्रचार अपराध मानता है। परन्तु हिन्दुओं के विरुद्ध इनके नेता और संगठन खुले आम दुष्प्रचार करते हैं। इस विधेयक में उनको अपराधी नहीं माना गया है। इनका मानना है कि अल्पसंख्यक समाज का कोई भी व्यक्ति साम्प्रदायिक तनाव या हिंसा के लिये दोषी नहीं है। वास्तविकता ठीक इसके विपरीत है। भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व में इनके धार्मिक नेताओं के भाषण व लेखन अन्य धर्मावलम्बियों के विरुद्ध विषवमन करते हैं। भारत में भी कई न्यायिक निर्णयों और आयोगों की रिपोर्टों में इनके भाषणों और कृत्यों को ही साम्प्रदायिक तनाव के मूल में बताया गया है। ओडीसा और गुजरात की जिन घटनाओं का ये बार-बार प्रलाप करते हैं, उनके मूल में भी आयोगों और न्यायालयों नें अल्पसंख्यकों की हिंसा को पाया है। मूल अपराध को छोडकर प्रतिक्रिया वाले को ही दंडित करना न केवल देश के कानून के विपरीत है अपितु किसी भी सभ्य समाज की मान्यताओं के खिलाफ है।
स्वतंत्र भारत के इतिहास में कथित अल्पसंख्यक समाज द्वारा हिंदू समाज पर १,५०,००० से अधिक हमले हुए हैं तथा हिन्दुओं के मंदिरों पर लगभग ५०० बार हमले हुए हैं। २०१० में बंगाल के देगंगा में हिंदुओं पर किये गये अत्याचारों को देखकर यह नहीं लगता कि यह भारत का कोई भाग है। बरेली और अलीगढ में हिन्दू समाज पर हुऍ हमले ज्यादा पुराने नहीं हुए हैं। एक विदेशी पत्रकार द्वारा विदेश में ही पैगम्बर साहब के कार्टून बनाने पर भारत में कई स्थानों पर हिन्दुओं पर हमले किसी से छिपे नहीं हैं। अपराधी को छोडना और पीडित को ही जिम्मेदार मानना क्या किसी भी प्रकार से उचित माना जा सकता है? एक अन्य सैक्युलर नेता,सैम राजप्पा ने लिखा है,” आज जबकि देश साम्प्रदायिक हिंसा से मुक्ति चाहता है, यह अधिनियम मानकर चलता है कि साम्प्रदायिक दंगे बहुसंख्यक के द्वारा होते हैं और उनको ही सजा मिलनी चाहिये। यह बहुत भेदभावपूर्ण है।”(दी स्टेट्समैन,६जून,२०११)
२. अनुच्छेद ७ के अनुसार यदि एक मुस्लिम महिला के साथ दुर्व्यवहार होता है तो वह अपराध है, परन्तु हिन्दू महिला के साथ किया गया बलात्कार अपराध नहीं है जबकि अधिकांश दंगों में हिन्दू महिला की इज्जत ही निशाने पर रहती है।
३. जिस समुदाय की रक्षा के बहाने से इस शैतानी विधेयक को लाया गया है, उसको इस विधेयक में” समूह” का नाम दिया है। इस समूह में कथित अल्पसंख्यकों के अतिरिक्त अनुसूचित जातियों और जनजातियों को भी शामिल किया गया है। क्या इन वर्गों में परस्पर संघर्ष नहीं होता? शिया-सुन्नी के परस्पर खूनी संघर्ष जगजाहिर हैं। इसमें किसकी जिम्मेदारी तय करेंगे? अनुसूचित जातियों के कई उपवर्गों में कई बार संघर्ष होते हैं,हालांकि इन संघर्षों के लिये अधिकांशतः ये सैक्युलर बिरादरी के लोग ही जिम्मेदार होते हैं। इन सबका यह मानना है कि उनकी समस्याओं का समाधान हिंदू समाज का अविभाज्य अंग बने रहने में ही हो सकता है। यह हिन्दू समाज को भी विभक्त करने का षडयंत्र है। इन दंगों की रोकथाम क्या इस अधिनियम से हो पायेगी? इन संघर्षों को रोकने के लिये जिस सदभाव की आवश्यक्ता होती है, इस कानून के बाद तो उसकी धज्जियां ही उधडने वाली हैं।
४. इस विधेयक में बहुसंख्यक हिन्दू समाज को कट्घरे में खडा किया गया है। सोनिया जी को ध्यान रखना चाहिये कि हिन्दू समाज की सहिष्णुता की इन्होनें कई बार तारीफ की है। कांग्रेस के एक अधिवेशन में इन्होनें कहा था कि भारत में हिन्दू समाज के कारण ही सैक्युलरिज्म जिंदा है और जब तक हिन्दू रहेगा भारत सैक्युलर रहेगा। विश्व में जिसको भी प्रताडित किया गया, उसको हिंदू नें शरण दी है। जब यहूदियों, पारसियों और सीरियन ईसाइयों को अपनी ही जन्मभूमि में प्रताडित किया गया था तब हिन्दू ने ही इनको शरण दी थी। अब उसी हिन्दू को निशाना बनाने की जगह साम्प्रदायिक तनावों के मूल को समझना चाहिये। सोनिया जी को वोट बैंक की चिंता छोडकर देशहित का विचार करना चाहिये। यदि ये सहिष्णु हिन्दू समाज को एक नरभक्षी दानव के रूप में दिखायेंगे तो साम्प्रदायिक वैमनस्य की खाई और चौडी हो जायेगी जिसे कोई नहीं पाट सकेगा। सलाहकार परिषद के ही एक सदस्य, एन.सी. सक्सेना ने कहा था ,” यदि अल्पसंख्यक समुदाय के किसी व्यक्ति द्वारा बहुसंख्यक समाज के किसी व्यक्ति पर अत्याचार होता है तो यह विषय भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत आयेगा, प्रस्तावित अधिनियम में नहीं।” (दी पायनीयर,२३ जून,२०११) इस कानून का संरक्षण केवल बहुसंख्यक समाज के लिये नहीं , अल्पसंख्यक समाज के लिये भी है। फिर इस अधिनियम की आवश्यक्ता ही क्या है? क्या इससे उनके इरादों का पर्दाफाश नहीं हो जाता?
५.इस विधेयक में साम्प्रदायिक हिंसा की परिभाषा दी है,” वह कृत्य जो भारत के सैक्युलर ताने बाने को तोडेगा।” भारत में सैक्युलरिज्म की परिभाषा अलग-अलग है। भारतीय संविधान में या इस विधेयक में कहीं भी इसे परिभाषित नहीं किया गया। क्या अफजल गुरू को फांसी की सजा से बचाना,आजमगढ जाकर आतंकियों के हौंसले बढाना, बटला हाउस में पुलिस वालों के बलिदान को अपमानित कर आतंकियों की हिम्मत बढाना,मुम्बई हमले में बलिदान हुए लोगों के बलिदान पर प्रश्नचिंह लगाना, मदरसों में आतंकवाद के प्रशिक्षण को बढावा देना, बंग्लादेशी घुसपैठियों को बढावा देना सोनिया जी की निगाहों में सैक्युलरिज्म है और इनके विरुद्ध आवाज उठाना सैक्युलर ताने-बाने को तोडना? ये लोग सैक्युलरिज्म की मनमानी परिभाषा देकर क्या देशभक्तों को प्रताडित करना चाहते हैं?
६.विधेयक के उपबंध ७४ के अनुसार यदि किसी व्यक्ति के ऊपर घृणा सम्बन्धी प्रचार या साम्प्रदायिक हिंसा का आरोप है तो उसे तब तक दोषी माना जायेगा जब तक कि वह निर्दोष सिद्ध न हो जाये। यह उपबंध संविधान की मूल भावना के विपरीत है। भारत का संविधान कहता है कि जब तक अपराध सिद्ध न हो जाये तब तक आरोपी निर्दोष माना जाये। यदि यह विधेयक पास हो जाता है तो किसी को भी जेल में भेजने के लिये उस पर केवल आरोप लगाना पर्याप्त रहेगा। उसके लिये अपने आप को निर्दोष सिद्ध करना कठिन ही नहीं असम्भव हो जायेगा। इस विधेयक में यह भी प्रावधान है कि अगर किसी हिन्दू के किसी व्यवहार से उसे मानसिक कष्ट हुआ है तो वह भी प्रताडना की श्रेणी में आयेगा। इसका अर्थ है कि अब किसी अल्पसंख्यक नेता के कुकृत्य या देश विरोधी काम के बारे में नहीं कहा जा सकता।
७.यदि किसी राज्य के कर्मचारी के विरुद्ध इस प्रकार का आरोप है तो उसके लिये उस राज्य का मुख्यमंत्री भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है क्योंकि वह उसे नहीं रोक सका है। इसका अर्थ है कि अब झूठी गवाही के आधार पर किसी भी विरोधी पक्ष के मुख्यमंत्री को फंसाना अब ज्यादा आसान हो जायेगा। जो मुख्यमंत्री अब तक इनके जाल में नहीं फंस पा रहे थे, अब उनके लिये जाल बिछाना ज्यादा आसान हो जायेगा।
८. यदि किसी संगठन का कोई कार्यकर्ता आरोपित है तो उस संगठन का मुखिया भी जिम्मेदार होगा क्योंकि वह भी इस अपराध में शामिल माना जायेगा। अब ये लोग किसी भी हिंदू संगठन व उनके नेताओं को आसानी से जकड सकेंगे। कसर अब भी नहीं छोड रहे परन्तु अब वे अधिक मजबूती से इन पर रोक लगा कर मनमानी कर सकेंगे।
९. यदि दुर्भाग्य से यह विधेयक पास हो जाता है तो राज्य सरकार के अधिकारों को केन्द्र सरकार आसानी के साथ हडप सकती है। कानून व्यवस्था राज्य सरकार का विषय होती है। केन्द्र सरकार ऐसे विषयों पर सलाह दे सकती है या “एड्वाइजरी” जारी कर सकती है। इससे भारत का संघीय ढांचा सुरक्षित रहता है। परन्तु अब संगठित साम्प्रदायिक और किसी सम्प्रदाय को लक्ष्य बनाकर की जाने वाली हिंसा राज्य के भीतर आंतरिक उपद्रव के रूप में देखी जायेगी। पहले केन्द्र सरकार की मंशा अनुच्छेद ३५५ का उपयोग कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की थी। परन्तु अब इस कदम को वापस लेकर वे राजनीतिक दलों के विरोध की धार को कुंद करना चाहते हैं। परन्तु इनके राज्य सरकारों को कुचलने के इरादों में कोई कमी नहीं आयी है।
१०. प्रस्तावित अधिनियम में निगरानी व निर्णय लेने के लिये जिस प्राधिकरण का प्रावधान है उसमें ७ सदस्य होंगे। अध्यक्ष, उपाध्यक्ष समेत इन ७ में से ४ सदस्य अल्पसंख्यक वर्ग के होंगे। क्या इससे परस्पर अविश्वास नहीं बढेगा? इसका मतलब यह स्पष्ट है कि हर व्यक्ति ,चाहे किसी भी पद पर हो, केवल अपने समुदाय की चिंता करता है। इस चिंतन का परिणाम क्या होगा इस पर देश को अवश्य विचार करना होगा। किसी न्यायिक प्राधिकरण का साम्प्तदायिक आधार पर विभाजन देश को किस ओर ले जायेगा?
११. इस प्राधिकरण को असीमित अधिकार दिये गये हैं। ये न केवल पुलिस व सशस्त्र बलों को सीधे निर्देश दे सकते हैं अपितु इनके सामने दी गई गवाही न्यायालय के सामने दी गई गवाही मानी जायेगी। इसका अर्थ है कि तीस्ता जैसी झूठे गवाह तैय्यार करने वाली अब अधिक खुल कर अपने षडयंत्रों को अन्जाम दे सकेंगी।
१२. अनुच्छेद १३ सरकारी कर्मचारियों पर इस प्रकार शिकन्जा कसता है कि वे मजबूरन अल्पसंख्यकों का साथ देने के लिये मजबूर होंगे चाहे वे ही अपराधी क्यों न हों।
१३.यदि यह विधेयक लागू हो जाता है तो किसी भी अल्पसंख्यक व्यक्ति के लिये किसी भी बहुसंख्यक को फंसाना बहुत आसान हो जायेगा। वह केवल पुलिस में शिकायत दर्ज करायेगा और पुलिस अधिकारी को उस हिन्दु को बिना किसी आधार के भी गिरफ्तार करना पडेगा। वह हिन्दू किसी सबूत की मांग नहीं कर सकता क्योंकि अब उसे ही अपने को निरपराध सिद्ध करना है। वह शिकायतकर्ता का नाम भी नहीं पूछ सकता। अब पुलिस अधिकारी को ही इस मामले की प्रगति की जानकारी शिकायतकर्ता को देनी है जैसे कि वह उसका अधिकारी हो। शिकायतकर्ता अगर यह कहता है कि आरोपी के किसी व्यवहार, कार्य या इशारे से वह मानसिक रूप से पीडित हुआ है तो भी आरोपी दोषी माना जायेगा। इसका अर्थ है कि अब कोई भी किसी मौलवी या किसी पादरी के द्वारा किये गये किसी दुष्प्रचार की शिकायत भी नहिं कर सकेगा न ही वह उनके किसी घृणास्पद साहित्य का विरोध कर सकेगा।
१४. इस विधेयक के अनुसार अब पुलिस अधिकारी के पास असीमित अधिकार होंगे। वह जब चाहे आरोपी हिन्दू के घर की तलाशी ले सकता है। यह अन्ग्रेजों के द्वारा लाये गये कुख्यात रोलेट एक्ट से भी खतरनाक सिद्ध हो सकता है।
१५.इस विधेयक की धारा ८१ में कहा गया है कि ऐसे मामलों नियुक्त विशेष न्यायाधीश किसी अभियुक्त के ट्रायल के लिये उसके समक्ष प्रस्तुत किये बिना भी उसका संज्ञान ले सकेगा और उसकी संपत्ति को भी जब्त कर सकेगा।
१६.किसी अल्पसंख्यक के व्यापार में बाधा डालना भी इसमें अपराध है। यदि कोई मुसलमान किसी हिंदू की सम्पत्ति को खरीदना चाहता है और वह हिंदू मना करता है तो इसमें वह अपराध बन जायेगा।
१७.अब हिन्दू को इस अधिनियम में इस कदर कस दिया जायेगा कि उसको अपने बचाव का एक ही रास्ता दिखाई देगा कि वह धर्मांतरण को मजबूर हो जायेगा। इसके कारण धर्मांतरण की गतिविधियों में जबर्दस्त तेजी आयेगी।
इस विधेयक के कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों का ही विश्लेषण किया जा सका है। जैसा चित्र अभी तक सामने आया है यदि यह पास हो जाता है तो परिस्थिती और भी भयावह होगी। आपात काल में किये गये मनमानीपूर्ण निर्णय भी फीके पड जायेंगे। हिन्दू का हिन्दू के रूप में रहना और भी मुश्किल हो जायेगा। मनमोहन सिंह ने पहले कहा था कि देश के संसाधनों पर मुसलमानों का पहला अधिकार है। यह विधेयक इस कथन का नया संस्करण है। इस विधेयक के विरोध में एक सशक्त आंदोलन खडा करना पडेगा तभी इस तानाशाहीपूर्ण कदम पर रोक लगाई जा सकती है।

Tuesday, 19 July 2011

राष्ट्रीय सलाहकार परिषद' का प्रस्तावित हिन्दू विरोधी काला कानून

श्रीमती सोनिया गाँधी की अध्यक्षता में बनाई गई "राष्ट्रीय सलाहकार समिति" द्वारा तैयार किया गया प्रस्तावित "सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा रोकथाम (न्याय एवं क्षतिपूर्ति) विधेयक 2011" एक कला कानून है जो यदि संसद द्वारा पारित कर दिया गया तो देश का माहौल दूषित हो जाएगा. मुस्लिम, ईसाई आदि अल्पसंख्यक समूहों को बहुसंख्यक समुदाय के प्रति घृणा फ़ैलाने, उन्हें प्रताड़ित करने और बहुसंख्यक महिलाओं के साथ बलात्कार करने एवं सामाजिक वैमनस्य फ़ैलाने के लिए प्रोत्साहन मिल जाएगा.

इस प्रस्तावित कानून का मंतव्य निम्न है --
  • इस विधेयक में 'समूह' शब्द का प्रयोग किया गया है. 'समूह' की परिभाषा में केवल धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक वर्ग ही हैं और केवल इस 'समूह' के विरुद्ध घृणा, हिंसा, बलात्कार आदि किया गया अपराध ही अपराध माना जाएगा. यही अपराध बहुसंख्यक वर्ग के लोगों के साथ होते हैं तो उस पर कार्रवाई का कोई प्रावधान विधेयक में नहीं है.
  • यदि कोई अल्पसंख्यक व्यक्ति उपरोक्त अपराधों के लिए किसी बहुसंख्यक व्यक्ति या संगठन के विरुद्ध शिकायत करता है तो उसकी जांच किए बिना ही उस व्यक्ति एवं संगठन को अपराधी मानकर उसका संज्ञान लिया जाएगा. इस अपराध की असत्यता सिद्ध करना अपराधी का दायित्व होगा. शिकायतकर्ता की पहचान गुप्त रखी जाएगी.
  • शिकायकर्ता की पहचान झूठी पाए जाने पर उसके खिलाफ कार्रवाई का विधेयक में कोई प्रावधान नहीं है. यानि अगर किसी व्यक्ति का कोई अल्पसंख्यक पड़ोसी किसी निजी रंजिश के चलते भी ऐसा कोई आरोप लगा देता है तो उस व्यक्ति का जेल जाना तो तय है. बाद में यदि शिकायत झूठी भी पाई गई तो उस शिकायकर्ता पर किसी कार्रवाई का प्रावधान नहीं है.
  • विधेयक में ये मान लिया गया है कि सांप्रदायिक हिंसा केवल बहुसंख्यक समुदाय के सदस्यों द्वारा ही पैदा की जाती है और अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्य कभी ऐसा कर ही नहीं सकते. क्या कोई अल्पसंख्यक व्यक्ति अपराध या हिंसा नहीं करता या नहीं कर सकता ?
  • विधेयक में ये भी कहा गया है कि यदि किसी अल्पसंख्यक ने रोजगार या किराये पर घर मांग लिया तो बिना योग्यता या अनुकूलता का विचार किए उसे घर या रोजगार देना होगा, यदि बहुसंख्यक ऐसा नहीं करता है तो वो अपराधी होगा.
  • पुलिस व प्रशासन अल्पसंख्यकों का कवच बन जाएगी. कहीं भी अल्पसंख्यकों के विरुद्ध उपरोक्त कोई भी अपराध होता है तो प्रशासन की भी समान जिम्मेदारी होगी. इस प्रकार प्रशासन अपने को बचाने के लिए निर्दोष हिन्दुओं को प्रताड़ित करेगा परन्तु यदि हिन्दुओं के प्रति उपरोक्त अपराध होता है तो प्रशासन को परेशान होने की कोई आवश्यकता नहीं रहेगी.
  • इस विधेयक के अनुसार एक सात सदस्यीय राष्ट्रीय प्राधिकरण बनेगा जिसमें कम से कम चार (अध्यक्ष और उपाध्यक्ष सहित) सदस्य 'समूह' से अर्थात अल्पसंख्यक समुदाय के होंगे, बाकी 3 भी बहुसंख्यक के ही होंगे इसकी कोई गारंटी नहीं है. राज्य स्तर पर भी इसी आधार पर प्राधिकरण का गठन किया जाएगा. ये प्राधिकरण राज्य एवं केंद्र सरकार को सीधी सिफारिश कर सकता है और सरकारों को इसे सभी संसाधन भी उपलब्ध कराने होंगे.

इस विधेयक में धर्म या जाति के आधार पर भेदभाव क्यों किया गया ? अपराध तो अपराध है चाहे वह किसी भी वर्ग के व्यक्ति ने किया है.. क्या व्यक्ति को उसके धर्म या भाषा से अपराधी माना जाएगा ? संविधान में कहा गया है कि "कानून के समक्ष सभी समान हैं एवं कानून का सभी को समान संरक्षण प्राप्त है." यह हमारा मौलिक अधिकार है. फिर भाषा और धर्म के आधार पर भेदभाव क्यों ? ऐसे विधेयक की क्या आवश्यकता है जो धर्म व जाति के आधार पर भेदभाव करके संविधान के पंथ निरपेक्ष स्वरुप को और राष्ट्र की एकता और अखंडता को खतरे में डालकर जिहादी आतंकवादियों व अलगाववादियों का क़ानूनी हथियार बन जाए.
क्या इस कानून की अल्पसंख्यकों द्वारा मांग की गई थी ? क्या बहुसंख्यकों ने ऐसे कोई साप्रदायिक हमले किए थे ? यदि इस कानून की इतनी ही जरुरत थी तो इसे जम्मू एंड कश्मीर में क्यों नहीं लागू किया जाएगा ? आज़ादी के 64 सालों बाद ही इसकी जरुरत क्यों महसूस की गई ?
इस विधेयक को तैयार करने वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में सोनिया गाँधी के चुने हुए ऐसे लोग हैं जिनका हिंदुत्व विरोधी भाव सर्वज्ञात है. इस परिषद को विधेयक तैयार करने का अधिकार किसने दिया जब इस परिषद की संविधान व कानून में कोई व्यवस्था नहीं है, ऐसे में इसकी वैधानिकता क्या है ? श्रीमती सोनिया गाँधी कांग्रेस से बड़ी हो सकती हैं परन्तु संविधान व देश से बड़ी नहीं.

सांप्रदायिक हिंसा निषेध विधेयक:कांग्रेस का अराष्ट्रीय चेहरा

कांग्रेस के मूल स्वभाव और चरित्र को समझे बिना वर्तमान राजनीति के पतन का विश्लेषण संभव नहीं। विडंबना यह है कि कांग्रेस के सत्ता केंद्रित अहंकारी स्वभाव का प्रसार भारत की राजनीति में घर कर चुका है। सत्ता के लिए किसी भी सीमा तक जाना तथा राजनीति में वोट लाभ के लिए अनुपयोगी जनकल्याण को छोड़ देना इसका स्वभाव बन गया है। सत्ता की आतुरता और संघर्ष से घबराहट के कारण ही कांग्रेस ने 1947 में पाकिस्तान का प्रस्ताव स्वीकार करके भारत का विभाजन कराया। पचास के दशक में चीन के हाथ तिब्बत खोया और 1.25 लाख वर्ग किलोमीटर भूमि चीन तथा पाकिस्तान के कब्जे में जाने दी। लेडी एडविना माउंटबेटन के प्रभाव में नेहरू कश्मीर का मामला सरदार पटेल की सहमति के बिना राष्ट्रसंघ में ले गए जिस कारण धारा 370 का ऐसा संवैधानिक विधान लागू करवाया जो बाद में अलगाववाद तथा आतंकवाद के पोषण का सबसे बड़ा कारण बन गया। कांग्रेस की इसी सत्ताभोगी मानसिकता के कारण 1962 में चीन का हमला हुआ। 1965 में हम जीतकर भी हारे तो 1971 में इंदिरा गांधी को मिले अभूतपूर्व सर्वदलीय प्रशंसा और समर्थन के बावजूद शिमला समझौते में हम कश्मीर का मसला निर्णायक तौर पर हल नहीं कर सके। हालांकि उस समय पाकिस्तान की गर्दन हमारे हाथों में थी। इसी कारण उस समय वरिष्ठ कवि सोम ठाकुर ने लिखा था- 'इतिहास लिखा था खून से जो स्याही से काट दिया हमने।'
चुनावी लाभ के लिए दंगे, बेवजह पुलिसिया कार्रवाई, ब्ल्यू स्टार तथा 1984 के सिख विरोधी दंगों आदि से उसका सत्ताविलासी चरित्र और इतिहास साबित होता है। 1947 के बाद से आज तक सबसे ज्यादा हिंदू-मुस्लिम दंगे केवल कांग्रेस शासित राज्यों में हुए। संप्रग-1 व 2 के दौरान कांग्रेस ने सच्चर समिति से लेकर हज यात्रियों के लिए जरूरी पासपोर्ट तक में पुलिस जांच की जरूरत खत्म करके सामाजिक खाई पैदा करने का प्रयास किया है जिसे अच्छी तरह समझा जा सकता है।
आम जनता प्राय: इतिहास को जल्दी भुला देती है। कांग्रेस कितनी निर्मम और संवेदनहीन हो सकती है इसका सबसे भयानक उदाहरण यदि 1975 में लागू आपातकाल है तो ताजा उदाहरण सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद द्वारा प्रस्तावित सांप्रदायिक हिंसा निषेध विधेयक है। यह विधेयक कांग्रेस के विकृत एवं हिंदू विरोधी अराष्ट्रीय चरित्र का सबसे निकृष्ट उदाहरण है।
इस विधेयक द्वारा न केवल हिंदुओं को आक्रामक और अपराधी वर्ग में ला खड़ा करने, बल्कि हिंदू-मुस्लिमों के बीच शत्रुता पैदा कर हर गली-कस्बे में दंगे करवाने की साजिश है। यदि यह औरंगजेबी फरमान कानून की शक्ल लेता है तो किसी भी हिंदू पर कोई भी मुस्लिम नफरत फैलाने, हमला करने, साजिश करने अथवा नफरत फैलाने के लिए आर्थिक मदद देने या शत्रुता का भाव फैलाने के नाम पर मुकदमा दर्ज करवा सकेगा और उस बेचारे हिंदू को इस कानून के तहत कभी शिकायतकर्ता मुसलमान की पहचान तक का हक नहीं होगा। इसमें शिकायतकर्ता के नाम और पते की जानकारी उस व्यक्ति को नहीं दी जाएगी जिसके खिलाफ शिकायत दर्ज की जा रही है। इसके अलावा शिकायतकर्ता मुसलमान अपने घर बैठे शिकायत दर्ज करवा सकेगा। इसी प्रकार यौन शोषण व यौन अपराध के मामले भी केवल और केवल मुस्लिम हिंदू के विरुद्ध दर्ज करवा सकेगा और ये सभी मामले अनुसूचित जाति और जनजाति पर किए जाने वाले अपराधों के साथ समानांतर चलाए जाएंगे। इसका मतलब है कि संबंधित हिंदू व्यक्ति को कभी यह नहीं बताया जाएगा कि उसके खिलाफ शिकायत किसने दर्ज कराई है? इसके अलावा उसे एक ही तथाकथित अपराध के लिए दो बार दो अलग-अलग कानूनों के तहत दंडित किया जाएगा। यही नहीं, यह विधेयक पुलिस और सैनिक अफसरों के विरुद्ध उसी तरह बर्ताव करता है जिस तरह से कश्मीरी आतंकवादी और आइएसआइ उनके खिलाफ रुख अपनाते हैं। विधेयक में 'समूह' यानी मुस्लिम के विरुद्ध किसी भी हमले या दंगे के समय यदि पुलिस, अ‌र्द्धसैनिक बल अथवा सेना तुरंत और प्रभावी ढंग से स्थिति पर नियंत्रण प्राप्त नहीं करती तो उस बल के नियंत्रणकर्ता अथवा प्रमुख के विरुद्ध आपराधिक धाराओं में मुकदमे चलाए जाएंगे। कुल मिलाकर हर स्थिति में पुलिस या अ‌र्द्धसैनिक बल के अफसरों को कठघरे में खड़ा होना होगा, क्योंकि स्थिति पर नियंत्रण जैसी परिस्थिति किसी भी ढंग से परिभाषित की जा सकती है। इस विधेयक की धाराएं किसी भी सभ्य, समान अधिकार संपन्न एवं भेदभावरहित गणतंत्र के लिए ईदी अमीन और सऊदी अरब के शाहों की तरह ही अन्य आस्थाओं के लोगों के प्रति नफरत एवं आक्रामकता का दर्शन कराती हैं।
प्रसिद्ध न्यायविद जेएस वर्मा और न्यायमूर्ति बीएल श्रीकृष्ण ने भी इस विधेयक को एकतरफा झुकाव वाला, केंद्र एवं राज्यों में अफसरशाही निर्मित करने वाला और केंद्र-राज्य संबंधों में नकारात्मक असर डालने वाला बताया है। जरा देखिए, इस विधेयक को बनाने वालों ने सांप्रदायिक हिंसा रोकने के लिए जिस सात सदस्यीय समिति के गठन की सिफारिश की है, उसमें चार सदस्य मजहबी अल्पसंख्यक होंगे। विधेयक मानकर चलता है कि यदि समिति में अल्पसंख्यकों यानी मुसलमानों का बहुमत नहीं होगा तो समिति न्याय नहीं कर सकेगी। अपेक्षा है कि ये सात सदस्य किसी भी सांप्रदायिक हिंसा को रोकेंगे, जांच पर नजर रखेंगे, आपराधिक मुकदमों, पेशियों, राहत कार्यो तथा पुनर्वास को अपनी देखरेख में चलाएंगे। आखिर ये सात सदस्य होंगे या फरिश्ते अथवा फिर आपातकाल के दारोगा?
[तरुण विजय: लेखक राज्यसभा के सदस्य हैं] 

Wednesday, 6 July 2011

'राष्ट्रीय सलाहकार परिषद' का प्रस्तावित हिन्दू विरोधी काला कानून


श्रीमती सोनिया गाँधी की अध्यक्षता में बनाई गई "राष्ट्रीय सलाहकार समिति" द्वारा तैयार किया गया प्रस्तावित "सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा रोकथाम (न्याय एवं क्षतिपूर्ति) विधेयक 2011" यदि संसद द्वारा पारित कर दिया गया तो मुसलिम, ईसाई आदि अल्पसंख्यक समूहों को हिन्दुओं के प्रति घृणा फ़ैलाने, हिन्दुओं को प्रताड़ित करने  और हिन्दू महिलाओं से बलात्कार करने के लिए प्रोत्साहन मिल जाएगा. 
इस प्रस्तावित कानून का मंतव्य ये है कि --
  1. यदि बहुसंख्यक वर्ग अर्थात हिन्दू किसी अल्पसंख्यक समूह के प्रति घृणा फैलाये या हिंसा करे या यौन उत्पीड़न करे तो हिन्दुओं को दण्डित करने का प्रावधान है.  किन्तु मुसलिम, ईसाई आदि अल्पसंख्यक समूहों द्वारा हिन्दुओं के प्रति घृणा फैलाई जाए या हिंसा की जाँच की जाए या बलात्कार आदि यौन शोषण किया जाए तो उन अल्पसंख्यकों को किसी प्रकार का दंड देने का कोई प्रावधान नहीं है.
  2. यदि कोई अल्पसंख्यक उपरोक्त अपराधों के लिए किसी बहुसंख्यक व्यक्ति या संगठन के विरुद्ध शिकायत करता है तो उसकी जांच किए बिना ही उस व्यक्ति एवं संगठन को अपराधी मानकर उसका संज्ञान लिया जाएगा. इस अपराध की असत्यता सिद्ध करना अपराधी का दायित्व होगा. शिकायत करता की पहचान गुप्त रखी जाएगी.
  3. इस विधेयक में 'समूह' की परिभाषा में केवल धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक वर्ग ही है,  बहुसंख्यक वर्ग के लिए समूह शब्द का प्रयोग नहीं है और केवल समूह के विरुद्ध घृणा, हिंसा आदि किया गया अपराध ही अपराध माना जाएगा.
  4. विधेयक में ये मान लिए गया है कि सांप्रदायिक हिंसा केवल बहुसंख्यक समुदाय के सदस्यों द्वारा ही पैदा की जाती है और अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्य  कभी ऐसा कर ही नहीं सकते. अतः बहुसंख्यक समुदाय के सदस्यों द्वारा अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के खिलाफ किए गये सांप्रदायिक अपराध तो दंडनीय हैं परन्तु अल्पसंख्यक समूहों द्वारा बहुसंख्याकों के खिलाफ किए गये ऐसे अपराध कतई दंडनीय नहीं माने गये हैं.
  5. अतः अल्पसंख्यक समुदय का कोई भी सदस्य इस कानून के तहत बहुसंख्यक समुदाय के विरुद्ध किए गये किसी अपराध के लिए दंडित नहीं किया जा सकता, केवल बहुसंख्यक समुदाय का सदस्य ही ऐसे अपराध कर सकता है और इसीलिए इस कानून का मंतव्य यह है कि केवल बहुसंख्यक समुद्र का सदस्य ही ऐसे अपराध कर सकते हैं, अतः उन्हें ही दोषी मानकर दंडित किया जाना चाहिए.
  6. किसी अल्पसंख्यक ने रोजगार या किराये पर घर मांग लिया तो बिना योग्यता या अनुकूलता का विचार किए आप यदि हा नहीं कहेंगे तो आप अपराधी होंगे.
  7. पुलिस व प्रशासन अल्पसंख्यकों का कवच बन जाएगी. कहीं भी अल्पसंख्यकों के विरुद्ध उपरोक्त कोई भी अपराध होता है तो प्रशासन की भी समान जिम्मेदारी होगी. इस प्रकार प्रशासन अपने को बचाने के लिए निर्दोष हिन्दुओं को प्रताड़ित करेगा परन्तु यदि हिन्दुओं के प्रति उपरोक्त अपराध होता है तो प्रशासन को परेशान होने की कोई आवश्यकता नहीं रहेगी.
  8. इस विधेयक के अनुसार एक सात सदस्यीय राष्ट्रीय प्राधिकरण बनेगा जिसमें कम से कम चार (अध्यक्ष और उपाध्यक्ष सहित) सदस्य 'समूह' अर्थात अल्पसंख्यक समुदाय के होंगे जिससे यह निश्चित है कि बहुसंख्यक समुद्र के सदस्य अल्पमत होंगे.
इस विधेयक में धर्म या जाति के आधार पर भेदभाव क्यों किया गया ? अपराध तो अपराध है चाहे वह किसी भी वर्ग के व्यक्ति ने किया है. सांप्रदायिक अपराध बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक नहीं होते.

ऐसे विधेयक की क्या आवश्यकता है जो धर्म व जाति के आधार पर भेदभाव करके संविधान के पंथ निरपेक्ष स्वरुप को और राष्ट्र की एकता और अखंडता को खतरे में डालकर आतंकवादियों व अलगाववादियों का क़ानूनी हथियार बन जाए.  

इस विधेयक को तैयार करने वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में सोनिया जी ने चुने हुए ऐसे लोग लिए हैं जिनका हिंदुत्व विरोधी भाव सर्वज्ञात है. इस परिषद को विधेयक तैयार करने का अधिकार किसने दिया जब इस परिषद की संविधान व कानून में कोई व्यवस्था नहीं है, ऐसे में इसकी वैधानिकता क्या है ? श्रीमती सोनिया गाँधी कांग्रेस से बड़ी हो सकती हैं परन्तु संविधान व देश से बड़ी नहीं.

सांप्रदायिक हिंसा विधेयक-एक काला कानून


सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा रोकथाम (न्याय एवं क्षतिपूर्ति) विधेयक 2011

यूपीए सरकार द्वारा गठित राष्ट्रीय सलाहकार समिति (http://nac.nic.in/) ने पिछले महीने सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा रोकथाम (न्याय एवं क्षतिपूर्ति) विधेयक 2011 को चर्चा और सुझावों के लिए आम जनता के सामने रखा था. ये विधेयक यूपीए सरकार द्वारा 2005 में बनाया गया था. तब से लेकर अब तक इसके मसौदे में काफी बदलाव आ चुका है. विधेयक द्वारा बेशक कुछ अच्छा होने की बात कही जा रही हो लेकिन इसके पीछे की मंशा एक समुदाय विशेष को खुश करना है जिसका इस्तेमाल वोट बैंक के रूप में किया जा सके और एक धर्म विशेष के लोगों को प्रताड़ित करना है.

किसी शायर ने कहा है कि "गुनाहगारों में शामिल हूँ, गुनाहों से नहीं वाकिफ, सजा तो जानता हूँ मैं, खुदा जाने खता क्या है" इस विधेयक के पास होने के बाद अर्थात कानून बनाने के बाद बहुसंख्यकों अर्थात हिन्दुओं की हालत भी कुछ ऐसी ही होगी. उन्हें सिर्फ इसलिए सजा मिलेगी क्योंकि वो बहुसंख्यक हैं, हिन्दू हैं.

विधेयक में यह स्पष्ट कहा गया है कि हिंसा, बलात्कार या घृणा सम्बन्धी प्रचार तभी अपराध मना जाएगा जब वो अल्पसंख्यकों के साथ किया गया हो. यदि किसी अल्पसंख्यक लड़की या महिला के साथ कुछ गलत किया जाता है तो वो अपराध होगा लेकिन यदि वैसे ही किसी बहुसंख्यक महिला के साथ किया जाता है तो वो कतई अपराध नहीं है. वहां पर विधेयक में कोई प्रावधान नहीं है. हिंसा और घृणा का प्रचार के मामले में भी इसी तरह अपराधी निर्धारित किया जाएगा. इस प्रकार लोकतंत्र और संविधान की मूल भावना पर चोट करके ये विधेयक बनाया गया है. संविधान में जगह-जगह समानता की बात की गई है लेकिन इस विधेयक का तो आधार असमानता है. विधेयक में धर्म और भाषाई आधार पर असमानता को तरजीह दी गई है.

विधेयक में दिए गये सभी प्रावधान साफ़-साफ़ एक वर्ग विशेष के तुष्टिकरण की ओर इशारा करते हैं. विधेयक में ये बात स्पष्ट तौर पर मान ली गई है कि केवल बहुसंख्यक वर्ग द्वारा ही हिंसा फैलाई जा सकती है,  अल्पसंख्यक तो हिंसा कर ही नहीं सकते और सिर्फ इसलिए क्योंकि वो अल्पसंख्यक हैं.

विधेयक में ये भी प्रावधान किया गया है कि सांप्रदायिक हिंसा के दौरान पूरी सरकारी मशीनरी अल्पसंख्यकों की खिदमत में लग जाए और बहुसंख्यकों वर्ग के अधिक से अधिक लोगों को दंड दिलाने का प्रयास करे. अतः अगर कहीं दंगा होता है तो पुलिस या अन्य सरकारी मशीनरी इस बात की जाँच नहीं करेगी कि दंगा किसने किया या उसके कारण क्या थे बल्कि उनका काम ये देखना होगा कि दंगे में बहुसंख्यक लोग कौन-कौन शामिल थे.

सांप्रदायिक हिंसा के दौरान बेशक पीड़ित बहुसंख्यक समाज हो लेकिन विधेयक केवल अल्पसंख्यकों को ही पीड़ित होने का प्रमाण पत्र प्रदान करता है, अतः बहुसंख्यक यानि हिन्दू पीड़ित हो ही नहीं सकते. इस प्रकार विधेयक एक वर्ग को ही हमेशा पीड़ित होने की गारंटी प्रदान करता है चाहे 50 अल्पसंख्यकों ने मिलकर 5 बहुसंख्यकों को मारा हो.
    
विधेयक में सजा देने का जो प्रावधान किया गया है वो भी आश्चर्यजनक है और न्याय की मूल धरना के विपरीत है. सजा देने के लिए जो प्रक्रिया अपनाई जाएगी उसमें धारा 161 के तहत बयान रिकॉर्ड करने की बजाय 164 के तहत बयान दर्ज किए जायेंगे अर्थात सीधे अदालत के सामने बयान होंगे. साथ ही यदि किसी व्यक्ति पर घृणा के प्रचार सम्बन्धी आरोप लगाया जाता है तो उसे तब तक दोषी मना जाएगा जब तक कि वो निर्दोष सिद्ध नहीं हो जाता. जबकि न्याय के अनुसार कोई व्यक्ति तब तक दोषी या अपराधी नहीं मना जाता जब तक कि उस पर दोष सिद्ध न हो जाए. इस मामले में आरोप ही सबूत का काम करेगा यानि यदि किसी अल्पसंख्यक ने किसी बहुसंख्यक पर आरोप मात्रा भी लगा दिया तो वो दोषी मान लिया जाएगा.

विधेयक के द्वारा सरकारी मशीनरी, पुलिस, सशस्त्र बल, लोकसेवकों आदि को भी एक वर्ग विशेष के हित में कार्य करने का दबाव बनाया जा सकता है या एक वर्ग विशेष द्वारा उनके ब्लैकमेलिंग की पूरी-पूरी सम्भावना बनी रहेगी. 

विधेयक के खंड 12 के अनुसार कोई सरकारी कर्मचारी यदि किसी समूह विशेष के व्यक्ति को पीड़ा पहुंचता है या मानसिक अथवा शारीरिक चोट पहुंचता है तो उसे यातना दिए जाने के अपराध में दण्डित किया जा सकता है. खंड 13  के अनुसार कोई सरकारी व्यक्ति इस विधेयक में उल्लिखित अपराधों के सम्बन्ध में अपनी ड्यूटी निभाने में ढिलाई बरतता है तो वो दंड का भागी होगा. खंड 14 में उन सरकारी व्यक्तियों को दंड का प्रावधान है जो सशस्त्र बालों पर नियंत्रण रखते हैं और अपनी कमान के लोगों पर कारगर ढंग से अपनी ड्यूटी निभाने हेतु नियंत्रण रखने में असफल रहते हैं. इसी प्रकार इस विधेयक के द्वारा लोकसेवकों पर बिना किसी सरकारी अनुमति के मुकदमा चलाया जा सकता है. ऐसे में स्पष्ट है कि लोकसेवक पर एक वर्ग विशेष के हित में कार्य करने के लिए व्यापक दबाव रहेगा.
विधेयक में सांप्रदायिक सौहार्द, न्याय और क्षतिपूर्ति के लिए एक राष्ट्रीय प्राधिकरण गठित किया जाएगा. इस सात सदस्यीय प्राधिकरण में भी धर्म और भाषाई आधार पर जमकर भेदभाव किया जाएगा. 7 सदस्यों में से कम से कम 4 सदस्य, जिसमें दो वरिष्ठतम पद अध्यक्ष और उपाध्यक्ष भी शामिल हैं, अल्पसंख्यक होने चाहिए. राज्यों पर भी इसी आधार पर राज्य प्राधिकरण गठित किया जाएगा. सरकारों को इस प्राधिकरण को पुलिस और अन्य दूसरी जांच एजेंसियों उपलब्ध करानी होंगी. प्राधिकरण के पास किसी शिकायत की जाँच करने, किसी ईमारत में घुसने, छापा मारने, खोजबीन करने का अधिकार होगा. प्राधिकरण सशस्त्र बालों पर भी नियंत्रण रख सकेगा और केंद्र एवं राज्य सरकारों को परामर्श जारी कर सकेगा.

अतः कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी की सुपर कैबिनेट ने एक ऐसा बिल तैयार किया है जिसके बाद बहुसंख्यक यानि हिन्दू अपंग हो जायेंगे. पुलिस, सशस्त्र बल आदि पंगु हो जायेंगे. अपराधी और पीड़ित किसी दंगे से पहले ही घोषित हो जाएगा. इस विधेयक को पूरा पढने के लिए इस लिंक पर (http://nac.nic.in/pdf/pctvb_amended.pdf) क्लिक करें.